अयूब 12:1-24 CGOCV2024 - Bible AI

1तब अयूब ह जबाब दीस:

2“तुमन सोचथव कि सिरिप तुमन ही महत्व के मनखे अव

3पर मोर म घलो तुम्हर सहीं समझ हवय;

4“मेंह अपन संगीमन बर ठिठोली के बिसय बन गे हवंव,

5जऊन मन अराम के जिनगी जीयथें, ओमन दुखी मनखे ले घिन करथें

6लुटेरामन के डेरा म कोनो समस्या नइं आवय,

7“पर पसुमन ले पुछ, अऊ ओमन तोला सिखोहीं,

8या धरती ले गोठिया, अऊ येह तोला सिखोही,

9ये जम्मो म ले कोन ह नइं जानय

10ओकर हांथ म जम्मो जीवमन के जिनगी

11का कान ह सबदमन ला नइं परखय,

12का सियान मनखेमन के बीच म बुद्धि नइं पाय जावय?

13“बुद्धि अऊ बल परमेसर के अय;

14जऊन ला ओह टोर-फोर देथे, ओला फेर नइं बनाय जा सकय;

15यदि ओह पानी ला रोक देथे, त उहां सूखा पड़थे;

16बल अऊ बुद्धि परमेसर के अंय;

17ओह सासन करइयामन ला ओमन के अधिकार ले अलग कर देथे

18ओह राजामन के दुवारा डारे गे बेड़ी ला निकाल देथे

19ओह पुरोहितमन ला ओमन के अधिकार ले अलग कर देथे

20ओह भरोसावाले सलाहकारमन के बोलती बंद कर देथे

21ओह उच्च घराना के मनखेमन के अपमान करथे

22ओह अंधियार के गहिरा बातमन ला परगट कर देथे

23ओह देसमन ला महान करथे, अऊ ओमन ला नास घलो करथे;

24ओह धरती के अगुवामन के बिबेक ला छीन लेथे;

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