अयूब 15:1-34 CGOCV2024 - Bible AI

1तब तेमान के रहइया एलीपज ह जबाब दीस:

2“का बुद्धिमान मनखे बिगर सोचे-बिचारे जबाब दीही

3का ओमन बेकार के गोठ ले बहस करहीं

4पर तेंह परमेसर के आदर ला कम करथस

5तोर पाप ह तोर मुहूं ला गोठियाय बर उकसावत हे;

6मेंह नइं, पर तोर खुद के मुहूं के गोठ ह तोला दोसी ठहिरात हे;

7“का जम्मो मनखे म सबले पहिली तेंह जनमे?

8का तें परमेसर के सभा म बईठके सुनथस?

9तेंह अइसे का जानथस, जऊन ला हमन नइं जानन?

10पाके चुंदीवाला अऊ सियानमन हमर तरफ हवंय,

11का परमेसर के ढाढ़स देवई,

12तोर मन ह तोला काबर आने कोति लेगत हे,

13कि तेंह अपन गुस्सा ला परमेसर के बिरोध म परगट कर

14“मरनहार मनखे ह का अय कि ओह सुध हो सकय

15यदि परमेसर ह अपन पबितर मनखेमन ऊपर भरोसा नइं करय,

16त फेर मरनहार मनखेमन के का हिसाब, जऊन मन दुस्ट अऊ भ्रस्ट अंय,

17“मोर बात ला सुन अऊ मेंह तोला समझाहूं;

18ओ बात जऊन ला बुद्धिमान मनखेमन अपन पुरखामन ले पाय रिहिन,

19(सिरिप पुरखामन ला देस दिये गे रिहिस

20दुस्ट मनखे ह अपन जिनगी भर पीरा सहथे,

21भयभीत करइया अवाज ओकर कान म गूंजत रहिथे;

22ओला अंधियार म ले बच निकले के बिसवास नइं रहय;

23ओह गिधवा के सहीं जेवन बर एती-ओती किंदरत रहिथे;

24पीरा अऊ बिपत्ति के भय ले ओह भरे रहिथे;

25काबरकि ओह परमेसर के ऊपर मुक्का तानथे

26अऊ ओकर बिरोध म उतावला होके

27“हालाकि ओकर चेहरा म चरबी बड़ गे हवय

28पर ओह उजरे नगरमन म अऊ ओ घरमन म रहिही

29ओह अऊ धनवान नइं रहिही अऊ ओकर धन बने नइं रहय,

30ओह अंधियार ले नइं बांच पाही;

31ओह बेकार के बातमन म भरोसा करके अपनआप ला धोखा झन देवय,

32अपन समय के पहिली ओह मुरझा जाही,

33ओह ओ अंगूर के नार सहीं होही जेकर कइंचा अंगूरमन झरके गिर जाथें,

34काबरकि भक्तिहीन के संगति म रहइया बिगर फर के होही,

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