1मोर मन ह टूट गे हवय,
2खचित ठट्ठा करइयामन मोर चारों कोति हवंय;
3“हे परमेसर, मोला छोंड़ाय बर जमानत दे।
4तेंह ओमन के समझ के सक्ति ला बंद कर दे हवस;
5कहूं कोनो अपन लाभ बर अपन संगीमन के चारी-चुगली करथे,
6“परमेसर ह मोला जम्मो झन बर एक कहावत बना दे हवय,
7मोर आंखीमन दुख के कारन धुंधला गे हवंय;
8सीधवा मनखेमन येला देखके अचम्भो करथें;
9तभो ले, धरमीमन अपन रद्दा ला धरे रहिहीं,
10“पर आवव, तुमन जम्मो झन, फेर कोसिस करव!
11मोर जीये के दिनमन तो बीत गीन, मोर योजनामन छितिर-बितिर हो गे हवंय।
12ओमन रथिया ला दिन म बदल देथें;+ 17:12 या सच ला झूठ म बदल देथें*
13कहूं मेंह कोनो घर के आसा करंव, त ओह सिरिप कबर अय,
14कहूं मेंह भ्रस्ट काम ला कहंव, ‘तें मोर ददा अस,’
15त फेर मोर आसा कहां हवय—