1तब नामात के रहइया सोपर ह जबाब दीस:
2“मोर बियाकुल बिचार ह मोला उकसावत हे कि मेंह जबाब दंव
3मेंह एक डांट सुनेंव, जेकर ले मोर अपमान होथे,
4“खचित तेंह जानत हस कि पुराना जमाना ले येह कइसे हवय,
5दुस्टमन के खुसी ह थोरकून समय के अय,
6हालाकि भक्तिहीन मनखे के घमंड ह अकास तक हबरथे
7पर ओह अपन खुद के संडास सहीं सदाकाल बर नास हो जाही;
8सपना कस ओह उड़ जाथे, अऊ फेर कभू नइं मिलय,
9जऊन आंखी ह ओला देखे रिहिस, ओह ओला फेर नइं देखही;
10ओकर लइकामन गरीबमन ले दया के आसा करहीं;
11जऊन जवानी के बल ह ओकर हाड़ामन म भरे रहिथे,
12“हालाकि बुरई ह ओकर मुहूं म मीठ लगथे
13हालाकि ओह ओला छोंड़े बर नइं चाहय
14तभो ले ओकर जेवन ह पेट म करू हो जाही;
15जऊन धन ला ओह लील ले रिहिस, ओह ओला निकाल दीही;
16ओह सांपमन के जहर ला चुहकही;
17ओह ओ झरना अऊ नदियामन के आनंद नइं उठा सकही,
18जेकर बर ओह कठोर मेहनत करिस, ओला बिगर खाय ओह वापिस करही;
19काबरकि ओह कंगालमन ऊपर अतियाचार करे हवय अऊ ओमन ला बेसहारा छोंड़ दे हवय;
20“खचित, ओकर लालसा के कभू अन्त नइं होवय;
21खाय बर ओकर लिये कुछू नइं बांचे हवय;
22ओकर धन अऊ सफलता के समय म ओला दुख ह घेर लीही;
23जब ओह अपन पेट ला भर चुके होही,
24हालाकि ओह लोहा के हथियार ले बच निकलथे,
25ओह ये बान ला तीरके ओकर पीठ ले निकालथे,
26ओकर धन-संपत्ति बर घिटके अंधियार ह बाट जोहथे।
27अकास ह ओकर अपराध ला परगट करही;
28पानी के बाढ़ ह ओकर घर ला बोहाके ले जाही,