अयूब 20:1-28 CGOCV2024 - Bible AI

1तब नामात के रहइया सोपर ह जबाब दीस:

2“मोर बियाकुल बिचार ह मोला उकसावत हे कि मेंह जबाब दंव

3मेंह एक डांट सुनेंव, जेकर ले मोर अपमान होथे,

4“खचित तेंह जानत हस कि पुराना जमाना ले येह कइसे हवय,

5दुस्टमन के खुसी ह थोरकून समय के अय,

6हालाकि भक्तिहीन मनखे के घमंड ह अकास तक हबरथे

7पर ओह अपन खुद के संडास सहीं सदाकाल बर नास हो जाही;

8सपना कस ओह उड़ जाथे, अऊ फेर कभू नइं मिलय,

9जऊन आंखी ह ओला देखे रिहिस, ओह ओला फेर नइं देखही;

10ओकर लइकामन गरीबमन ले दया के आसा करहीं;

11जऊन जवानी के बल ह ओकर हाड़ामन म भरे रहिथे,

12“हालाकि बुरई ह ओकर मुहूं म मीठ लगथे

13हालाकि ओह ओला छोंड़े बर नइं चाहय

14तभो ले ओकर जेवन ह पेट म करू हो जाही;

15जऊन धन ला ओह लील ले रिहिस, ओह ओला निकाल दीही;

16ओह सांपमन के जहर ला चुहकही;

17ओह ओ झरना अऊ नदियामन के आनंद नइं उठा सकही,

18जेकर बर ओह कठोर मेहनत करिस, ओला बिगर खाय ओह वापिस करही;

19काबरकि ओह कंगालमन ऊपर अतियाचार करे हवय अऊ ओमन ला बेसहारा छोंड़ दे हवय;

20“खचित, ओकर लालसा के कभू अन्त नइं होवय;

21खाय बर ओकर लिये कुछू नइं बांचे हवय;

22ओकर धन अऊ सफलता के समय म ओला दुख ह घेर लीही;

23जब ओह अपन पेट ला भर चुके होही,

24हालाकि ओह लोहा के हथियार ले बच निकलथे,

25ओह ये बान ला तीरके ओकर पीठ ले निकालथे,

26ओकर धन-संपत्ति बर घिटके अंधियार ह बाट जोहथे।

27अकास ह ओकर अपराध ला परगट करही;

28पानी के बाढ़ ह ओकर घर ला बोहाके ले जाही,

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