अयूब 21:1-33 CGOCV2024 - Bible AI

1तब अयूब ह जबाब दीस:

2“मोर गोठ ला धियान देके सुनव;

3मोर गोठ के पूरा होवत ले धीरज धरव,

4“का मोर सिकायत कोनो मनखे ले हवय?

5मोला देखव अऊ अचम्भो करव;

6जब में येकर बारे म सोचथंव, त मोर म भय छा जाथे;

7दुस्ट मनखेमन काबर जीयत रहिथें,

8ओमन अपन लइकामन ला अपन चारों कोति बसत देखथें,

9ओमन के घर सुरकछित रहिथे अऊ उहां डर नइं रहय;

10ओमन के सांड़मन गाभिन करे म कभू नइं चुकंय;

11ओमन अपन लइकामन ला बरदी के रूप म भेजथें;

12ओमन खंजरी अऊ बीना के धुन म गाथें;

13ओमन अपन जिनगी के दिन सम्पन्नता म बिताथें

14तभो ले ओमन परमेसर ला कहिथें, ‘हमन ला अकेला छोंड़ दे!

15सर्वसक्तिमान कोन ए कि हमन ओकर सेवा करन?

16पर ओमन के सम्पन्नता ओमन के हांथ म नइं ए,

17“तभो ले दुस्टमन के दीया ह कतेक बार बुताथे?

18ओमन कतेक बार हवा के आघू म भूंसा कस होथें,

19ये कहे जाथे, ‘परमेसर ह दुस्टमन के सजा ला ओमन के लइकामन बर कुढ़ोके रखथे।’

20ओमन अपनेच आंखी ले अपन बिनास ला देखंय;

21काबरकि ओमन अपन बाद अपन परिवार के का फिकर करथें

22“का कोनो मनखे परमेसर ला गियान दे सकथे,

23एक मनखे अपन पूरा बल सहित मरथे,

24अपन देहें ला पुस्ट करके,

25आने मनखे ह अपन जीव के करूवाहट म मरथे,

26एक के बाजू म एक, ओमन धुर्रा म लेटे रहिथें,+ 21:26 या ओमन एक समान मरथें अऊ ओमन ला माटी दिये जाथे*

27“मेंह बने करके जानत हंव कि तुमन का सोचत हव,

28तुमन पुछथव, ‘अब ओ बड़े मनखे के घर कहां हवय,

29का कभू तुमन ओमन ले सवाल करेव, जऊन मन डहार रेंगथें?

30कि दुस्टमन बिपत्ति के दिन ले बचाय जावत हें,

31कोन ह ओमन के मुहूं के आघू म ओमन के चालचलन के बुरई करही?

32ओमन ला कबर म अमराय जाथे,

33घाटी के माटी ह ओमन ला गुरतूर लगथे;

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