अयूब 27:1-22 CGOCV2024 - Bible AI

1अऊ अयूब ह अपन बात ला आगे कहिस:

2“जीयत परमेसर के किरिया, जऊन ह मोला नियाय नइं दे हवय,

3जब तक मोर म परान हवय,

4तब तक मेंह मोर मुहूं ले कोनो खराप बात नइं गोठियावंव,

5मेंह कभू नइं मानंव कि तुमन सही अव;

6मेंह अपन धरमीपन ला बनाय रखहूं अऊ एकर ले बाहिर नइं जावंव;

7“मोर बईरी ह दुस्ट मनखे कस,

8जब भक्तिहीन मनखेमन मर जाथें, त ओमन करा का आसा रहिथे,

9जब ओमन ऊपर संकट आथे,

10का ओमन ला सर्वसक्तिमान म खुसी मिलही?

11“मेंह तुमन ला परमेसर के सामर्थ के बारे म सिखाहूं;

12तुमन जम्मो ये बात ला देख डारे हव।

13“दुस्ट मनखे के बांटा म परमेसर ह ये चीज देथे,

14चाहे ओकर कतको लइका रहंय, ओमन तलवार ले घात करे जाहीं;

15ओकर जऊन मनखेमन बांच जाहीं, ओमन महामारी ले मर जाहीं,

16हालाकि ओह चांदी ला धुर्रा कस कुढ़ोथे

17पर जऊन ओनहा के ढेर ओह लगाथे, ओला धरमी मनखे ह पहिरही,

18जऊन घर ओह बनाथे, ओह कीरा के घरौंदा कस अय,

19ओह धनी होके सुतथे, पर अब अइसने नइं कर सकही;

20आतंक ह ओला बाढ़ कस घेर लेथे;

21पुरवई हवा ह ओला उड़िया ले जाथे, अऊ ओह नइं रहय;

22ओ हवा ह बिगर दया के ओला ओकर बिरूध उठाके फटिकथे;

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