अयूब 29:1-24 CGOCV2024 - Bible AI

1अयूब ह अपन बात ला आगे कहिस:

2“कास मोर स्थिति ह पहिली के महिनामन सहीं हो जातिस,

3जब ओकर दीया के अंजोर ह मोर मुड़ म परत रिहिस

4ओ दिनमन मोर बढ़िया दिन+ 29:4 या सम्पन्नता के दिन* रिहिन,

5जब सर्वसक्तिमान ह मोर संग म रिहिस

6जब मोर रसता ह मलाई ले गीला होवत रिहिस

7“जब मेंह सहर के कपाट करा जावंव

8त जवानमन मोला देखके डहार छोंड़ देवंय

9मुखिया मनखेमन अपन गोठियाई बंद कर देवंय

10आदरनीय मनखेमन चुप हो जावंय,

11जऊन कोनो मोर बात ला सुनय, ओह मोला बने कहय,

12काबरकि मेंह मदद मंगइया गरीब

13मिरतू के खटिया म परे मनखे ह मोला आसीरबाद देवय;

14मेंह धरमीपन ला कपड़ा सहीं पहिर ले रहेंव;

15मेंह अंधरामन बर आंखी

16में जरूरतमंद बर ददा सहीं रहेंव;

17मेंह दुस्टमन के दांत ला टोरंव

18“मेंह सोचेंव, ‘में अपन घर म ही मरहूं,

19मोर जरी ह पानी तक हबरही,

20मोर महिमा ह नइं मुरझाही;

21“मनखेमन मोर बात ला मन लगाके सुनंय,

22मोर गोठियाय के बाद ओमन अऊ नइं गोठियांय;

23ओमन बारिस के सहीं मोर बाट जोहंय

24जब मेंह ओमन ऊपर मुस्करावंव, त ओमन मुसकुल से येला बिसवास करंय;

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