1“का तेंह लिबयातान+ 41:1 देखव 3:8ला* ला मछरी धरे के गरी ले तीरके निकाल सकथस
2का तेंह ओकर नाक म नत्थी लगा सकथस
3का ओह तोर ले दया के भीख मांगही?
4का ओह तोर ले करार करही
5का तेंह ओला कोनो चिरई के सहीं पालतू बना सकथस
6का बेपारीमन ओकर बर मोलभाव करहीं?
7का तेंह ओकर खाल ला भाला ले,
8यदि तेंह ओकर ऊपर अपन हांथ रखथस,
9ये बेकार के आसा ए कि तेंह ओला अपन अधिकार म रखबे;
10काकरो हिम्मत नइं ए कि ओला भड़कावंय।
11कोन ह मोला देय हवय कि मेंह ओला लहुंटावंव?
12“मेंह लिबयातान के अंग, ओकर बल
13कोन ह ओकर बाहिर के आवरन ला उतार सकत हे?
14कोन ह ओकर मुहूं ला खोले के हिम्मत कर सकथे?
15ओकर पीठ म तह के तह ढालमन हवंय,
16ओमन एक-दूसर ले अइसे संटे हवंय
17ओमन एक-दूसर ले मजबूती ले जुड़े हवंय;
18ओकर छींक ले अंजोर चमकथे;
19ओकर मुहूं ले बरत जुवाला निकलथे;
20ओकर नाक के छेदा ले धुआं निकलथे
21ओकर सांस ले कोइला ह बरथे,
22ओकर घेंच म ताकत रहिथे;
23ओकर मांस-पेसी के परतमन कसके जूरे हवंय;
24ओकर छाती ह पथरा कस कठोर हवय,
25जब ओह ठाढ़ होथे, त बलवालामन घलो डरा जाथें;
26ओकर ऊपर तलवार चलाय ले घलो ओला कुछू नइं होवय,
27ओह लोहा ला पैंरा सहीं
28बान ह ओला भगाय नइं सकय;
29लउठी घलो ओला पैंरा सहीं लगथे;
30ओकर खाल्हे के भाग ह माटी के फटे बरतन के धार सहीं अय,
31ओह समुंदर के पानी ला खउलत हांड़ी के सहीं मथथे
32ओह अपन पाछू म एक चमकीला धारी छोंड़त जाथे;
33धरती म ओकर बरोबर कोनो चीज नइं ए—