नीतिबचन 11:1-30 CGOCV2024 - Bible AI

1यहोवा ह बेईमानी के तौल ले बहुंत घिन करथे,

2जब घमंड आथे, त अपमान घलो आथे,

3ईमानदार मनखेमन ला ओमन के ईमानदारी ह अगुवई करथे,

4कोप के बेरा म धन ले कोनो लाभ नइं होवय,

5निरदोस मनखेमन के धरमीपन ह ओमन के रसता ला सीधा करथे,

6ईमानदार मनखेमन के धरमीपन ह ओमन ला बचाथे,

7दुस्ट मनखेमन के संग ओमन के आसा घलो टूट जाथे;

8धरमी मनखेमन बिपत्ति ले बचाय जाथें,

9भक्तिहीन मनखेमन अपन बात ले अपन परोसी ला नास करथें,

10जब धरमी मनखेमन उन्नति करथें, त सहर के मनखेमन आनंद मनाथें;

11धरमी मनखेमन के आसीस ले सहर के उन्नति होथे।

12जऊन ह अपन परोसी के हंसी उड़ाथे, ओह निरबुद्धि ए,

13लबारी बात ह बिसवास ला टोरथे,

14मार्ग-दरसन के अभाव म देस ह बिपत्ति म पड़थे,

15जऊन ह अजनबी के जमानत लेथे, ओह दुख उठाथे,

16दयालु माईलोगन ह आदरमान पाथे,

17दयालु मनखेमन अपन बर लाभ कमाथें,

18दुस्ट मनखे ह छल-कपट के कमई करथे,

19धरमीमन सही म जिनगी पाथें,

20यहोवा ह हठी मनखे ले घिन करथे,

21ये बात बर निस्चित रहव: दुस्ट ह जरूर दंड पाही,

22जऊन सुघर माईलोगन ह समझदारी नइं देखाय,

23धरमीमन के ईछा के अन्त सिरिप भलई म होथे,

24एक मनखे ह दिल खोलके देथे, तभो ले ओकर बढ़ती होथे;

25उदार मनखे के उन्नति होही,

26मनखेमन ओ मनखे ला सराप देथें, जऊन ह अनाज ला दबाके रखे रहिथे,

27जऊन ह भलई करे चाहथे, ओकर ऊपर किरपा करे जाथे,

28जऊन मन अपन धन ऊपर भरोसा रखथें, ओमन गिरहीं,

29जऊन ह अपन परिवार ला दुख देथे, ओला बांटा म कुछू नइं मिलय,

30धरमी के परतिफल जिनगी के रूख होथे,

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