नीतिबचन 14:1-34 CGOCV2024 - Bible AI

1बुद्धिमान माईलोगन ह अपन घर ला बनाथे,

2जऊन ह यहोवा के भय मानथे, ओह ईमानदारी से चलथे,

3मुरूख ला ओकर घमंड के बात के कारन दंड मिलथे,

4जिहां बईलामन नइं रहंय, त उहां कोटना ह खाली रहिथे,

5ईमानदार गवाह ह धोखा नइं देवय,

6ठट्ठा करइया ह बुद्धि ला खोजथे, पर नइं पावय,

7मुरूख मनखे ले दूरिहा रहव,

8बुद्धिमान के बुद्धि ह ओला समझ देथे,

9मुरूख मनखेमन पाप स्वीकार करई ला ठट्ठा के बात समझथें

10मन ह अपन खुद के दुख ला जानथे,

11दुस्ट के घर ह नास करे जाही,

12एक डहार हवय, जऊन ह मनखे ला सही जान पड़थे,

13अइसे हो सकथे कि हंसी के बेरा घलो मन उदास होवय,

14बिसवासहीन मनखे ह अपन काम के पूरा फल भोगही,

15सीधवा मनखे ह कोनो भी बात के बिसवास करथे,

16बुद्धिमान मनखे ह यहोवा ले डरथे अऊ बुरई ले दूरिहा रहिथे,

17जऊन ह तुरते गुस्सा होथे, ओह मुरूखता के काम करथे,

18सीधा-साधा मनखे के भाग म मुरूखता होथे,

19खराप मनखेमन, बने मनखे के आघू म,

20गरीब मनखे ला ओकर परोसीमन घलो छोंड़ देथें,

21जऊन ह अपन परोसी ला तुछ समझथे, ओह पाप करथे,

22का जऊन मन दुस्ट युक्ति करथें, ओमन अपन रसता ले नइं भटकंय?

23कठिन मेहनत करे ले लाभ होथे,

24बुद्धिमान के धन ह ओकर मुकुट ए,

25एक सच्चा गवाह ह जिनगी बचाथे,

26जऊन ह यहोवा के भय मानथे, ओकर भरोसा ह मजबूत होथे,

27यहोवा के डर ह जिनगी के झरना ए,

28मनखेमन के बहुंत संखिया ह राजा के महिमा अय,

29जऊन ह धीरज धरथे, ओह समझदार अय,

30मन म सांति ह देहें ला जिनगी देथे,

31जऊन ह गरीब ला सताथे, ओह ओकर बनानेवाला+ 14:31 याने कि परमेसर सिरिस्टीकर्ता* के अनादर करथे,

32जब बिपत्ति आथे, त दुस्टमन नास हो जाथें,

33समझदार मनखे के मन म बुद्धि ह निवास करथे

34धरमीपन ले मनखे के जाति+ 14:34 याने कि जाति के सम्मान* के बढ़ती होथे,

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