नीतिबचन 21:1-30 CGOCV2024 - Bible AI

1यहोवा के हांथ म राजा के मन ह पानी के नरवा सहीं अय

2मनखे ह सोचथे कि ओकर खुद के चालचलन ह सही अय,

3सही अऊ नियाय के काम करई ह

4घमंड ले चढ़े आंखी अऊ घमंडीमन—

5मेहनती मनखे के योजना ले लाभ होथे

6लबारी मारके कमाय गे धन ह

7दुस्टमन के हिंसक काम ह ओमन ला नास कर दीही,

8दोसी मनखे के काम ह टेढ़ा होथे,

9झगड़ालू घरवाली के संग घर म रहई के बदले

10दुस्ट मनखेमन बुरई करे के लालसा करथें;

11जब ठट्ठा करइया ला दंड मिलथे, त सधारन मनखे ह बुद्धि पाथे;

12धरमी जन ह दुस्ट मनखे के घर ऊपर नजर रखथे

13जऊन ह गरीब के गोहार ला नइं सुनय,

14गुपत म दिये गे भेंट ले गुस्सा ह सांत होथे,

15जब नियाय मिलथे, त येकर से धरमी ह आनंदित होथे

16जऊन ह समझदारी के रसता ले भटक जाथे,

17जऊन ह मऊज-मस्ती ले मया करथे, ओह गरीब हो जाही;

18दुस्ट मनखे ह धरमी जन बर छुड़ौती ठहिरथे,

19झगरा करइया अऊ चिढ़ देवइया घरवाली के संग रहे के बदले

20बुद्धिमान मनखे ह मनभावन जेवन अऊ जैतून तेल जमा करथे,

21जऊन ह धरमीपन अऊ मया करे म लगे रहिथे,

22बुद्धिमान मनखे ह सूरबीरमन के सहर म चढ़ई करके

23जऊन मन अपन मुहूं अऊ जीभ ला बस म रखथें,

24घमंडी अऊ जिद्दी मनखे ला “ठट्ठा करइया” कहिथें—

25आलसी मनखे के ईछा ह ओला मार डालथे,

26दिन भर ओह ईछा करते रहिथे,

27दुस्ट के बलिदान ह घिन के चीज होथे—

28लबरा गवाह ह नास होही,

29दुस्ट मनखे के मुहूं ह कठोर होथे,

30अइसे कोनो बुद्धि, समझ या योजना नइं ए,

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