1दुस्ट मनखे के बारे म जलन झन रखबे,
2काबरकि ओमन हिंसा के बात सोचथें,
3बुद्धि के दुवारा घर ह बनथे,
4गियान के जरिये येकर कमरामन
5बुद्धिमान ह अपन बड़े सक्ति के जरिये जय पाथे,
6खचित, लड़ई बर तोला सही युक्ति के जरूरत हवय,
7बुद्धि ह अतेक ऊपर म हवय कि मुरूख ह ओला पा नइं सकय;
8जऊन ह दुस्टता के सडयंत्र रचथे,
9मुरूखता के योजना बनई ह पाप ए,
10यदि बिपत्ति के बेरा तेंह लड़खड़ाथस,
11जऊन मन ला मार डाले बर ले जावथें, ओमन ला छुड़ा;
12यदि तेंह कहिथस, “पर हमन येकर बारे म कुछू नइं जानत रहेंन,”
13हे मोर बेटा, मंधरस ला खा, काबरकि येह बने अय;
14ये बात ला घलो जान ले कि बुद्धि ह तोर बर मंधरस के सहीं अय:
15धरमी मनखे के घर के लकठा म एक चोर के सहीं घात झन लगा,
16काबरकि धरमी जन चाहे सात बार ले गिरे, पर ओह फेर उठही,
17जब तोर बईरी ह गिरथे, त खुस झन होबे;
18नइं तो यहोवा ह येला देखही अऊ खुस नइं होही
19कुकरमीमन के कारन झन कुढ़
20काबरकि कुकरमी के कोनो भविस्य नइं ए,
21हे मोर बेटा, यहोवा अऊ राजा के भय मान,
22काबरकि ओ दूनों ओमन के अचानक बिनास कर दीहीं,
23बुद्धिमान मनखे के कहावत ये घलो अंय:
24जऊन ह दोसी मनखे ला कहिथे, “तेंह निरदोस अस,”
25पर जऊन मन दोसी ला दोसी ठहिराथें, ओमन के भलई होही,
26एक ईमानदार जबाब ह
27अपन बाहिर के काम ला ठीक कर ले
28बिगर कारन के, अपन परोसी के बिरूध गवाही झन देबे,
29ये झन कहिबे, “जइसने ओमन मोर संग करे हवंय, वइसने मेंह ओमन के संग करहूं;
30मेंह एक आलसी के खेत ले
31त देखेंव कि उहां हर जगह कंटिला पऊधामन भर गे हवंय,
32ओमन ला धियान से देखके, मन म बिचार करेंव
33थोरकन अऊ नींद, थोरकन अऊ ऊंघासी,