नीतिबचन 29:1-26 CGOCV2024 - Bible AI

1जऊन ह बार-बार डांटे ले घलो हठी बने रहिथे

2जब धरमीमन उन्नति करथें, त मनखेमन आनंदित होथें;

3जऊन मनखे ह बुद्धि ले मया करथे, ओह अपन ददा ला आनंदित करथे,

4नियाय के दुवारा राजा ह देस ला इस्थिर करथे,

5जऊन मन अपन परोसीमन के चापलूसी करथें

6दुस्ट मनखेमन अपन खुद के पाप म फंसथें,

7धरमी मनखे ह गरीब मनखे के नियाय ऊपर धियान देथे,

8ठट्ठा करइयामन सहर ला उत्तेजित करथें,

9यदि कोनो बुद्धिमान मनखे ह कोनो मुरूख मनखे के संग अदालत जाथे,

10खून करइया मनखेमन ईमानदार मनखे ले घिन करथें

11मुरूख मनखेमन अपन गुस्सा ला पूरा परगट करथें,

12यदि कोनो सासन करइया ह लबारी बात ऊपर कान लगाथे,

13गरीब अऊ अतियाचारी मनखे म एक बात समान्य हवय:

14यदि कोनो राजा ह गरीब के सही नियाय करथे,

15छड़ी अऊ डांट खाय ले बुद्धि मिलथे,

16जब दुस्टमन बढ़थें, त पाप ह घलो बढ़थे,

17अपन लइकामन ला अनुसासित करव, अऊ ओमन तुमन ला सांति दीहीं;

18जिहां अगम के बारे म दरसन के बात नइं होवय, उहां मनखेमन निरंकुस हो जाथें;

19सेवकमन ला सिरिप बात के दुवारा सुधारे नइं जा सकय;

20का तेंह अइसने मनखे ला देखथस, जऊन ह उतावली म गोठियाथे?

21जऊन सेवक ला ओकर लइकापन ले बहुंत खवाय-पीयाय जाथे,

22गुस्सा करइया मनखे ह झगरा ला बढ़ाथे,

23घमंड ह मनखे ला नीचा देखाथे,

24चोरमन के सहभागीमन अपन खुद के बईरी होथें;

25मनखे के भय ह एक फांदा साबित होथे,

26बहुंत जन सासन करइया ले भेंट करे बर चाहथें,

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