1हे मोर मन, यहोवा के परसंसा कर।
2यहोवा ह अपनआप ला एक कपड़ा के सहीं अंजोर ले लपेटे रहिथे;
3अऊ अपन ऊपर के कमरा के मियारमन ला ओमन के पानी म रखथे।
4ओह हवा ला अपन संदेसिया+ 104:4 या स्वरगदूत*
5ओह धरती ला ओकर नीव म इस्थिर करथे;
6तेंह येला एक कपड़ा ढांपे सहीं गहिरा समुंदर ले ढांप दे हस;
7पर तोर डांटे ले पानी ह भाग गीस,
8ओमन पहाड़मन के ऊपर बहे लगिन,
9तेंह एक सीमना तय करय, जेला ओमन लांघ नइं सकंय;
10तेंह घाटीमन ले पानी के धारा निकालथस;
11ओमन भुइयां के जम्मो पसुमन ला पानी देथें;
12अकास के चिरईमन पानी के तीर म अपन खोंधरा बनाथें;
13ओह अपन ऊपरी कमरा ले पहाड़मन ऊपर पानी गिराथे;
14ओह पसुमन बर कांदी उगाथे,
15अंगूर के मंद, जेह मनखे के मन ला खुसी देथे,
16यहोवा के रूखमन ला
17उहां चिरईमन अपन खोंधरा बनाथें;
18ऊंच पहाड़मन जंगली छेरीमन बर होथें;
19ओह अलग-अलग मौसम ला बताय बर चंदा ला बनाईस,
20तेंह अंधियार लानथस, तब रथिया होथे,
21सिंहमन अपन सिकार बर गरजथें
22सूरज ह निकलथे, अऊ ओमन चुपेचाप चले जाथें;
23तब मनखेमन अपन-अपन काम म,
24हे यहोवा, तोर काममन बहुंते हवंय!
25समुंदर हवय, बहुंत बड़े अऊ लम्बा अऊ चौड़ा,
26उहां पानी जहाजमन आथें-जाथें,
27जम्मो जीवमन तोर कोति ताकथें
28जब तेंह ओमन ला जेवन देथस,
29जब तेंह अपन मुहूं ला छिपा लेथस,
30जब तेंह अपन आतमा ला भेजथस,
31यहोवा के महिमा ह सदाकाल तक बने रहय;
32जब ओह धरती ला देखथे, त धरती ह कांपथे,
33मेंह अपन जिनगी भर यहोवा के गीत गाहूं;
34जइसे कि मेंह यहोवा म आनंदित रहिथंव,