1“सचेत रहव! तुमन मनखेमन के आघू म ओमन ला देखाय बर अपन धरमीपन के काम झन करव। नइं तो तुमन ला अपन स्वरगीय ददा ले कुछू ईनाम नइं मिलय।
2“एकरसेति, जब तुमन जरूरतमंद मनखे ला देथव, त डुगडुगी झन पीटवाव, जइसने कि ढोंगी मनखेमन यहूदीमन के सभा-घर अऊ गलीमन म करथें, ताकि मनखेमन ओमन के बड़ई करंय। मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि ओमन अपन जम्मो ईनाम पा गीन।
3पर जब तुमन जरूरतमंद मनखे ला देथव, त तुम्हर डेरी हांथ ये बात ला झन जानय कि तुम्हर जेवनी हांथ का करत हवय।
4तुम्हर दान ह गुपत म रहय। तब तुम्हर स्वरगीय ददा, जऊन ह गुपत म करे गय काम ला घलो देखथे, तुमन ला ईनाम दीही।
5“जब तुमन पराथना करथव, त ढोंगी मनखेमन सहीं झन करव, काबरकि मनखेमन ला देखाय बर, यहूदीमन के सभा-घर अऊ गली के चऊकमन म ठाढ़ होके पराथना करई, ओमन ला बने लगथे। मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि ओमन अपन जम्मो ईनाम पा गीन।
6जब तुमन पराथना करथव, त अपन खोली म जावव, अऊ कपाट ला बंद करके, अपन ददा ले पराथना करव, जऊन ह नइं दिखय। तब तुम्हर ददा, जऊन ह गुपत म करे गय काम ला घलो देखथे, तुमन ला ईनाम दीही।
7अऊ जब तुमन पराथना करथव, त आनजातमन सहीं बेमतलब के बातमन ला घेरी-बेरी झन दुहराव, काबरकि ओमन ये सोचथें कि ओमन के बहुंत बात बोले के कारन, परमेसर ह ओमन के सुनही।
8ओमन सहीं झन बनव, काबरकि तुम्हर मांगे के पहिली, तुम्हर ददा ह जानथे कि तुमन ला का चीज के जरूरत हवय।
9“तुमन ला ये किसम ले पराथना करना चाही:
10तोर राज आवय,
11हमन ला हर दिन के सहीं आज के भोजन दे।
12हमर पापमन ला छेमा कर,
13अऊ हमन ला परिछा म झन पड़न दे,
14यदि तुमन ओ मनखेमन ला छेमा करथव, जऊन मन तुम्हर बिरोध म पाप करे हवंय, त तुम्हर स्वरगीय ददा घलो तुमन ला छेमा करही।
15पर यदि तुमन ओ मनखेमन के पाप ला छेमा नइं करव, त तुम्हर ददा घलो तुम्हर पाप ला छेमा नइं करही।
16“जब तुमन उपास करथव, त तुमन अपन चेहरा ला उदास झन बनावव, जइसने कि ढोंगीमन करथें; ओमन अपन चेहरा ला ओरमाय रहिथें, ताकि मनखेमन देखंय कि ओमन उपास करत हवंय। मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि ओमन अपन जम्मो ईनाम पा चुकिन।
17पर जब तुमन उपास करथव, त अपन मुड़ म तेल चुपरव अऊ मुहूं ला धोवव,
18ताकि मनखेमन ये झन जानंय कि तुमन उपास करत हवव, पर सिरिप तुम्हर ददा परमेसर ह जानय, जऊन ह नइं दिखय। अऊ तुम्हर ददा, जऊन ह हर गुपत के काम ला देखथे, तुमन ला ईनाम दीही।
19“अपन खातिर ये धरती म धन जमा झन करव, जिहां कीरा अऊ मुर्चा येला नास करथें, अऊ चोरमन सेंध मारके चोरा लेथें।
20पर अपन खातिर स्वरग म धन जमा करव, जिहां कीरा अऊ मुर्चा येला नास नइं कर सकंय, अऊ न ही चोरमन सेंध मारके चोरी कर सकंय।
21काबरकि जिहां तुम्हर धन हवय, उहां तुम्हर मन घलो लगे रहिही।
22“आंखी ह देहें के दीया अय। यदि तुम्हर आंखीमन ठीक हवंय, त तुम्हर जम्मो देहें ह अंजोर ले भर जाही।
23पर यदि तुम्हर आंखीमन खराप हवंय, त तुम्हर जम्मो देहें ह अंधियार ले भर जाही। एकरसेति, ओ अंजोर जऊन ह तुमन म हवय, यदि अंधियार हो जाथे, त ओह कतेक भयंकर अंधियार होही।+ 6:23 लूका 11:34‑36; यूह 9:39‑41; मत्ती 15:14*
24“कोनो भी मनखे दू झन मालिक के सेवा नइं कर सकय। या तो ओह एक झन ले नफरत करही अऊ दूसर झन ले मया; या फेर ओह एक झन बर समरपित रहिही अऊ दूसर झन ला तुछ जानही। तुमन परमेसर अऊ धन दूनों के सेवा नइं कर सकव।
25“एकरसेति, मेंह तुमन ला कहत हंव कि तुमन अपन जिनगी के बारे म चिंता झन करव कि तुमन का खाहू या का पीहू, अऊ न अपन देहें के बारे म चिंता करव कि तुमन का पहिरहू। का जिनगी ह भोजन ले जादा महत्व के नो हय? अऊ देहें ह ओनहा ले बढ़के नो हय?
26अकास के चिरईमन ला देखव; ओमन न कुछू बोवंय, न लुवंय अऊ न कोठार म जमा करंय; तभो ले तुम्हर स्वरगीय ददा ह ओमन ला खवाथे। का तुमन चिरईमन ले जादा महत्व के नो हव?
27तुमन म ले कोन ह चिंता करे के दुवारा अपन जिनगी के एको घरी ला घलो बढ़ा सकथे?
28“तुमन ओनहा बर काबर चिंता करथव? खेत के जंगली फूलमन ला देखव कि ओमन कइसने बाढ़थें। ओमन न तो मेहनत करंय अऊ न ही ओनहा बिनंय।
29तभो ले मेंह तुमन ला बतावत हंव कि राजा सुलेमान घलो अपन जम्मो सोभा म येमन ले एको झन सहीं नइं सजे-धजे रिहिस।
30यदि परमेसर ह भुइयां के कांदी ला, जऊन ह आज इहां हवय अऊ कल आगी म झोंक दिये जाही, अइसने ओनहा पहिराथे, त हे अल्प बिसवासीमन ओह तुमन ला अऊ बने ओनहा काबर नइं पहिराही?
31एकरसेति तुमन चिंता झन करव अऊ ये झन कहव कि हमन का खाबो? या का पीबो? या का पहिरबो?
32आनजातमन ये जम्मो चीज के खोज म रहिथें। तुम्हर स्वरगीय ददा ह जानथे कि तुमन ला ये जम्मो चीजमन के जरूरत हवय।
33पहिली परमेसर के राज अऊ ओकर धरमीपन के खोज करव, त ये जम्मो चीजमन घलो संग म तुमन ला दिये जाही।