1बुद्धिमान के सहीं कोन हे?
2मेंह सलाह देवत हंव, “राजा के हुकूम ला मान, काबरकि तेंह परमेसर के आघू म सपथ खाय हस।
3राजा ला छोंड़के जाय म जल्दबाजी झन करबे। गलत बात के तरफदारी झन करबे, काबरकि राजा ह ओही काम ला करही, जऊन ह ओला बने लगथे।”
4राजा के बात ह सबले बड़के होथे, त ओला कोन ह कह सकथे, “तेंह का करत हस?”
5जऊन ह ओकर हुकूम ला मानथे, ओकर नुकसान नइं होवय,
6काबरकि हर एक बात बर एक सही समय अऊ तरीका होथे,
7जब कोनो मनखे अगम के बात ला नइं जानय,
8हवा ला एक जगह म रखे के सक्ति काकरो करा नइं ए,
9ये जम्मो ला मेंह देखेंव, जब धरती ऊपर करे जावत हर एक काम ऊपर मेंह अपन मन ला लगांय। अइसन घलो समय होथे, जब मनखे ह दूसर ऊपर अधिकार करके अपन ही हानि करथे।
10तब मेंह दुस्टमन ला गाड़े जावत घलो देखेंव—जऊन मन पबितर स्थान ले आवत-जावत रिहिन अऊ सहर म महिमा पावत रिहिन जिहां ओमन दुस्टता करिन। येह घलो बेकार ए।
11जब अपराध के सजा जल्दी नइं दिये जावय, तब मनखेमन के हिरदय ह बुरई करे के योजना ले भर जाथे।
12हालाकि एक दुस्ट मनखे ह सौ अपराध करथे अऊ लम्बा समय तक जीयत रहिथे, पर मेंह जानत हंव कि ओमन ऊपर भलई होही, जऊन मन परमेसर के भय मानथें अऊ ओकर बर आदर के भाव रखथें।
13तभो ले काबरकि दुस्टमन परमेसर के भय नइं मानंय, एकरसेति ओमन के संग बने नइं होवय, अऊ ओमन के जिनगी ह छइहां के सहीं नइं बढ़य।
14एक अऊ बेकार बात हे, जऊन ह धरती ऊपर होथे: धरमी के संग अइसने बात होथे, जइसने कोनो दुस्ट के संग होना चाही, अऊ दुस्ट के संग अइसने बात होथे, जइसने कोनो धरमी के संग होना चाही। मेंह कहिथंव, येह घलो बेकार ए।
15एकरसेति मेंह जिनगी के आनंद ला उठाय के सराहना करथंव, काबरकि धरती म एक मनखे बर येकर ले अऊ कोनो बात बने नो हय कि ओह खावय-पीयय अऊ खुस रहय। तब आनंद ह ओमन के ओ जम्मो जिनगी के मेहनत म ओमन के संग रहिही, जेला परमेसर ह ओमन ला धरती म देय हवय।
16जब मेंह अपन मन बुद्धि ला जाने बर अऊ धरती ऊपर करे गय मेहनत ला समझे बर लगांय—मनखेमन ला दिन अऊ रात नींद नइं आवत रिहिस—