1मेंह अपन पहरा म ठाढ़े रहिहूं
2तब यहोवा ह मोला जबाब दीस:
3काबरकि ये दरसन के बात ह एक ठहिराय समय म पूरा होही;
4“देख, बईरी के मन ह फुल गे हवय;
5वास्तव म, अंगूर के मंद ह ओला धोखा देथे;
6“का ओ जम्मो झन ये कहिके ओकर हंसी नइं उड़ाहीं अऊ बेजत्ती करके ताना नइं मारहीं,
7का तुमन ला करजा देवइयामन अचानक तुम्हर मेर नइं आ जाहीं?
8काबरकि तुमन बहुंते जाति के मनखेमन ला लूटे हव,
9“ओकर ऊपर हाय, जऊन ह अनियाय के कमई ले अपन घर ला बनाथे,
10अपन ही घर ला लज्जित करके अऊ अपन ही परान ला जोखिम म डालके
11दीवार के पथरामन चिचियाहीं,
12“ओकर ऊपर हाय, जऊन ह लहू बोहाके एक सहर ला बनाथे
13का सर्वसक्तिमान यहोवा ह ये बात ला नइं ठान ले हवय
14काबरकि धरती ह यहोवा के महिमा के गियान ले अइसन भर जाही
15“ओकर ऊपर हाय, जऊन ह अपन परोसीमन ला मंद पीयाथे,
16तेंह महिमा के बदले लाज ले भर जाबे।
17तेंह जऊन हिंसा के काम लबानोन म करे हस, ओमन तोला बियाकुल करहीं,
18“एक कारीगर के दुवारा बनाय गे मूरती के का महत्व?
19ओकर ऊपर हाय, जऊन ह कठवा ले कहिथे, ‘जी उठ!’