अल्लाह के ख़ौफ़ और हिक्मत की बरकत
1मेरे बेटे, मेरी हिदायत मत भूलना। मेरे अह्काम तेरे दिल में मह्फ़ूज़ रहें।
2क्यूँकि इन ही से तेरी ज़िन्दगी के दिनों और सालों में इज़ाफ़ा होगा और तेरी ख़ुशहाली बढ़ेगी।
3शफ़्क़त और वफ़ा तेरा दामन न छोड़ें। उन्हें अपने गले से बांधना, अपने दिल की तख़्ती पर कन्दा करना।
4तब तुझे अल्लाह और इन्सान के सामने मेहरबानी और क़बूलियत हासिल होगी।
5पूरे दिल से रब पर भरोसा रख, और अपनी अक़ल पर तकिया न कर।
6जहाँ भी तू चले सिर्फ़ उसी को जान ले, फिर वह ख़ुद तेरी राहों को हमवार करेगा।
7अपने आप को दानिशमन्द मत समझना बल्कि रब का ख़ौफ़ मान कर बुराई से दूर रह।
8इस से तेरा बदन सेहत पाएगा और तेरी हड्डियाँ तर-ओ-ताज़ा हो जाएँगी।
9अपनी मिलकियत और अपनी तमाम पैदावार के पहले फल से रब का एहतिराम कर,
10फिर तेरे गोदाम अनाज से भर जाएंगे और तेरे बर्तन मै से छलक उठेंगे।
11मेरे बेटे, रब की तर्बियत को रद्द न कर, जब वह तुझे डाँटे तो रंजीदा न हो।
12क्यूँकि जो रब को प्यारा है उस की वह तादीब करता है, जिस तरह बाप उस बेटे को तम्बीह करता है जो उसे पसन्द है।
हक़ीक़ी दौलत
13मुबारक है वह जो हिक्मत पाता है, जिसे समझ हासिल होती है।
14क्यूँकि हिक्मत चाँदी से कहीं ज़्यादा सूदमन्द है, और उस से सोने से कहीं ज़्यादा क़ीमती चीज़ें हासिल होती हैं।
15हिक्मत मोतियों से ज़्यादा नफ़ीस है, तेरे तमाम ख़ज़ाने उस का मुक़ाबला नहीं कर सकते।
16उस के दहने हाथ में उम्र की दराज़ी और बाएँ हाथ में दौलत और इज़्ज़त है।
17उस की राहें ख़ुशगवार, उस के तमाम रास्ते पुरअम्न हैं।
18जो उस का दामन पकड़ ले उस के लिए वह ज़िन्दगी का दरख़्त है। मुबारक है वह जो उस से लिपटा रहे।
19रब ने हिक्मत के वसीले से ही ज़मीन की बुन्याद रखी, समझ के ज़रीए ही आसमान को मज़बूती से लगाया।
20उस के इर्फ़ान से ही गहराइयों का पानी फूट निकला और आसमान से शबनम टपक कर ज़मीन पर पड़ती है।
21मेरे बेटे, दानाई और तमीज़ अपने पास मह्फ़ूज़ रख और उन्हें अपनी नज़र से दूर न होने दे।
22उन से तेरी जान तर-ओ-ताज़ा और तेरा गला आरास्ता रहेगा।
23तब तू चलते वक़्त मह्फ़ूज़ रहेगा, और तेरा पाँओ ठोकर नहीं खाएगा।
24तू पाँओ फैला कर सो सकेगा, कोई सदमा तुझे नहीं पहुँचेगा बल्कि तू लेट कर गहरी नींद सोएगा।
25नागहाँ आफ़त से मत डरना, न उस तबाही से जो बेदीन पर ग़ालिब आती है,
26क्यूँकि रब पर तेरा एतिमाद है, वही तेरे पाँओ को फंस जाने से मह्फ़ूज़ रखेगा।
दूसरों की मदद करने की नसीहत
27अगर कोई ज़रूरतमन्द हो और तू उस की मदद कर सके तो उस के साथ भलाई करने से इन्कार न कर।
28अगर तू आज कुछ दे सके तो अपने पड़ोसी से मत कहना, “कल आना तो मैं आप को कुछ दे दूँगा।”
29जो पड़ोसी बेफ़िक्र तेरे साथ रहता है उस के ख़िलाफ़ बुरे मन्सूबे मत बांधना।
30जिस ने तुझे नुक़्सान नहीं पहुँचाया अदालत में उस पर बेबुन्याद इल्ज़ाम न लगाना।
31न ज़ालिम से हसद कर, न उस की कोई राह इख़तियार कर।
32क्यूँकि बुरी राह पर चलने वाले से रब घिन खाता है जबकि सीधी राह पर चलने वालों को वह अपने राज़ों से आगाह करता है।
33बेदीन के घर पर रब की लानत आती जबकि रास्तबाज़ के घर को वह बरकत देता है।
34मज़ाक़ उड़ाने वालों का वह मज़ाक़ उड़ाता, लेकिन फ़रोतनों पर मेहरबानी करता है।
35दानिशमन्द मीरास में इज़्ज़त पाएँगे जबकि अहमक़ के नसीब में शर्मिन्दगी होगी।