अजूर की कहावतें
1ज़ैल में अजूर बिन याक़ा की कहावतें हैं। वह मस्सा का रहने वाला था। उस ने फ़रमाया,
2यक़ीनन मैं इन्सानों में सब से ज़्यादा नादान हूँ, मुझे इन्सान की समझ हासिल नहीं।
3न मैं ने हिक्मत सीखी, न क़ुद्दूस ख़ुदा के बारे में इल्म रखता हूँ।
4कौन आसमान पर चढ़ कर वापस उतर आया? किस ने हवा को अपने हाथों में जमा किया? किस ने गहरे पानी को चादर में लपेट लिया? किस ने ज़मीन की हुदूद को अपनी अपनी जगह पर क़ाइम किया है? उस का नाम क्या है, उस के बेटे का क्या नाम है? अगर तुझे मालूम हो तो मुझे बता!
5अल्लाह की हर बात आज़मूदा है, जो उस में पनाह ले उस के लिए वह ढाल है।
6उस की बातों में इज़ाफ़ा मत कर, वर्ना वह तुझे डाँटेगा और तू झूटा ठहरेगा।
7ऐ रब, मैं तुझ से दो चीज़ें माँगता हूँ, मेरे मरने से पहले इन से इन्कार न कर।
8पहले, दरोग़गोई और झूट मुझ से दूर रख। दूसरे, न ग़ुर्बत न दौलत मुझे दे बल्कि उतनी ही रोटी जितनी मेरा हक़ है,
9ऐसा न हो कि मैं दौलत के बाइस सेर हो कर तेरा इन्कार करूँ और कहूँ, “रब कौन है?” ऐसा भी न हो कि मैं ग़ुर्बत के बाइस चोरी करके अपने ख़ुदा के नाम की बेहुरमती करूँ।
10मालिक के सामने मुलाज़िम पर तोहमत न लगा, ऐसा न हो कि वह तुझ पर लानत भेजे और तुझे इस का बुरा नतीजा भुगतना पड़े।
11ऐसी नस्ल भी है जो अपने बाप पर लानत करती और अपनी माँ को बरकत नहीं देती।
12ऐसी नस्ल भी है जो अपनी नज़र में पाक-साफ़ है, गो उस की ग़िलाज़त दूर नहीं हुई।
13ऐसी नस्ल भी है जिस की आँखें बड़े तकब्बुर से देखती हैं, जो अपनी पलकें बड़े घमंड से मारती है।
14ऐसी नस्ल भी है जिस के दाँत तलवारें और जबड़े छुरियाँ हैं ताकि दुनिया के मुसीबतज़दों को खा जाएँ, मुआशरे के ज़रूरतमन्दों को हड़प कर लें।
15जोंक की दो बेटियाँ हैं, चूसने के दो आज़ा जो चीख़ते रहते हैं, “और दो, और दो”
16पाताल, बाँझ का रहम, ज़मीन जिस की प्यास कभी नहीं बुझती और आग जो कभी नहीं कहती, “अब बस करो, अब काफ़ी है।”
17जो आँख बाप का मज़ाक़ उड़ाए और माँ की हिदायत को हक़ीर जाने उसे वादी के कव्वे अपनी चोंचों से निकालेंगे और गिद्ध के बच्चे खा जाएंगे।
18तीन बातें मुझे हैरतज़दा करती हैं बल्कि चार हैं जिन की मुझे समझ नहीं आती,
19आसमान की बुलन्दियों पर उक़ाब की राह, चटान पर साँप की राह, समुन्दर के बीच में जहाज़ की राह और वह राह जो मर्द कुंवारी के साथ चलता है।
20ज़िनाकार औरत की यह राह है, वह खा लेती और फिर अपना मुँह पोंछ कर कहती है, “मुझ से कोई ग़लती नहीं हुई।”
21ज़मीन तीन चीज़ों से लरज़ उठती है बल्कि चार चीज़ें बर्दाश्त नहीं कर सकती,
22वह ग़ुलाम जो बादशाह बन जाए, वह अहमक़ जो जी भर कर खाना खा सके,
23वह नफ़रतअंगेज़
24ज़मीन की चार मख़्लूक़ात निहायत ही दानिशमन्द हैं हालाँकि छोटी हैं।
25च्यूँटियाँ कमज़ोर नस्ल हैं लेकिन गर्मियों के मौसम में सर्दियों के लिए ख़ुराक जमा करती हैं,
26बिज्जू कमज़ोर नस्ल हैं लेकिन चटानों में ही अपने घर बना लेते हैं,
27टिड्डियों का बादशाह नहीं होता ताहम सब परे बांध कर निकलती हैं,
28छिपकलियाँ गो हाथ से पकड़ी जाती हैं, ताहम शाही महलों में पाई जाती हैं।
29तीन बल्कि चार जानदार पुरवक़ार अन्दाज़ में चलते हैं।
30पहले, शेरबबर जो जानवरों में ज़ोर-आवर है और किसी से भी पीछे नहीं हटता,
31दूसरे, मुर्ग़ा जो अकड़ कर चलता है, तीसरे, बकरा और चौथे अपनी फ़ौज के साथ चलने वाला बादशाह।
32अगर तू ने मग़रूर हो कर हमाक़त की या बुरे मन्सूबे बांधे तो अपने मुँह पर हाथ रख कर ख़ामोश हो जा,
33क्यूँकि दूध बिलोने से मक्खन, नाक को मरोड़ने