अय्यूब 22:1-30 DGV - Bible AI

इलीफ़ज़ : अय्यूब शरीर है

1फिर इलीफ़ज़ तेमानी ने जवाब दे कर कहा,

2“क्या अल्लाह इन्सान से फ़ाइदा उठा सकता है? हरगिज़ नहीं! उस के लिए दानिशमन्द भी फ़ाइदे का बाइस नहीं।

3अगर तू रास्तबाज़ हो भी तो क्या वह इस से अपने लिए नफ़ा उठा सकता है? हरगिज़ नहीं! अगर तू बेइल्ज़ाम ज़िन्दगी गुज़ारे तो क्या उसे कुछ हासिल होता है?

4अल्लाह तुझे तेरी ख़ुदातरस ज़िन्दगी के सबब से मलामत नहीं कर रहा। यह न सोच कि वह इसी लिए अदालत में तुझ से जवाब तलब कर रहा है।

5नहीं, वजह तेरी बड़ी बदकारी, तेरे ला-मह्दूद गुनाह हैं।

6जब तेरे भाइयों ने तुझ से क़र्ज़ लिया तो तू ने बिलावजह वह चीज़ें अपना ली होंगी जो उन्हों ने तुझे ज़मानत के तौर पर दी थीं, तू ने उन्हें उन के कपड़ों से महरूम कर दिया होगा।

7तू ने थकेमान्दों को पानी पिलाने से और भूके मरने वालों को खाना खिलाने से इन्कार किया होगा।

8बेशक तेरा रवय्या इस ख़याल पर मब्नी था कि पूरा मुल्क ताक़तवरों की मिलकियत है, कि सिर्फ़ बड़े लोग उस में रह सकते हैं।

9तू ने बेवाओं को ख़ाली हाथ मोड़ दिया होगा, यतीमों की ताक़त पाश पाश की होगी।

10इसी लिए तू फंदों से घिरा रहता है, अचानक ही तुझे दह्शतनाक वाक़िआत डराते हैं।

11यही वजह है कि तुझ पर ऐसा अंधेरा छा गया है कि तू देख नहीं सकता, कि सैलाब ने तुझे डुबो दिया है।

12क्या अल्लाह आसमान की बुलन्दियों पर नहीं होता? वह तो सितारों पर नज़र डालता है, ख़्वाह वह कितने ही ऊँचे क्यूँ न हों।

13तो भी तू कहता है, ‘अल्लाह क्या जानता है? क्या वह काले बादलों में से देख कर अदालत कर सकता है?

14वह घने बादलों में छुपा रहता है, इस लिए जब वह आसमान के गुम्बद पर चलता है तो उसे कुछ नज़र नहीं आता।’

15क्या तू उस क़दीम राह से बाज़ नहीं आएगा जिस पर बदकार चलते रहे हैं?

16वह तो अपने मुक़र्ररा वक़्त से पहले ही सुकड़ गए, उन की बुन्यादें सैलाब से ही उड़ा ली गईं।

17उन्हों ने अल्लाह से कहा, ‘हम से दूर हो जा,’ और ‘क़ादिर-ए-मुतलक़ हमारे लिए क्या कुछ कर सकता है?’

18लेकिन अल्लाह ही ने उन के घरों को भरपूर ख़ुशहाली से नवाज़ा, गो बेदीनों के बुरे मन्सूबे उस से दूर ही दूर रहते हैं।

19रास्तबाज़ उन की तबाही देख कर ख़ुश हुए, बेक़ुसूरों ने उन की हंसी उड़ा कर कहा,

20‘लो, यह देखो, उन की जायदाद किस तरह मिट गई, उन की दौलत किस तरह भस्म हो गई है!’

21ऐ अय्यूब, अल्लाह से सुलह करके सलामती हासिल कर, तब ही तू ख़ुशहाली पाएगा।

22अल्लाह के मुँह की हिदायत अपना ले, उस के फ़रमान अपने दिल में मह्फ़ूज़ रख।

23अगर तू क़ादिर-ए-मुतलक़ के पास वापस आए तो बहाल हो जाएगा, और तेरे ख़ैमे से बदी दूर ही रहेगी।

24सोने को ख़ाक के बराबर, ओफ़ीर का ख़ालिस सोना वादी के पत्थर के बराबर समझ ले

25तो क़ादिर-ए-मुतलक़ ख़ुद तेरा सोना होगा, वही तेरे लिए चाँदी का ढेर होगा।

26तब तू क़ादिर-ए-मुतलक़ से लुत्फ़अन्दोज़ होगा और अल्लाह के हुज़ूर अपना सर उठा सकेगा।

27तू उस से इल्तिजा करेगा तो वह तेरी सुनेगा और तू अपनी मन्नतें बढ़ा सकेगा।

28जो कुछ भी तू करने का इरादा रखे उस में तुझे कामयाबी होगी, तेरी राहों पर रौशनी चमकेगी।

29क्यूँकि जो शेख़ी बघारता है उसे अल्लाह पस्त करता जबकि जो पस्तहाल है उसे वह नजात देता है।

30वह बेक़ुसूर को छुड़ाता है, चुनाँचे अगर तेरे हाथ पाक हों तो वह तुझे छुड़ाएगा।”