अय्यूब 23:1-17 DGV - Bible AI

अय्यूब : काश मैं अल्लाह को कहीं पाता

1अय्यूब ने जवाब में कहा,

2“बेशक आज मेरी शिकायत सरकशी का इज़हार है, हालाँकि मैं अपनी आहों पर क़ाबू पाने की कोशिश कर रहा हूँ।

3काश मैं उसे पाने का इल्म रखूँ ताकि उस की सुकूनतगाह तक पहुँच सकूँ।

4फिर मैं अपना मुआमला तरतीबवार उस के सामने पेश करता, मैं अपना मुँह दलाइल से भर लेता।

5तब मुझे उस के जवाबों का पता चलता, मैं उस के बयानात पर ग़ौर कर सकता।

6क्या वह अपनी अज़ीम क़ुव्वत मुझ से लड़ने पर सर्फ़ करता? हरगिज़ नहीं! वह यक़ीनन मुझ पर तवज्जुह देता।

7अगर मैं वहाँ उस के हुज़ूर आ सकता तो दियानतदार आदमी की तरह उस के साथ मुक़द्दमा लड़ता। तब मैं हमेशा के लिए अपने मुन्सिफ़ से बच निकलता!

8लेकिन अफ़्सोस, अगर मैं मशरिक़ की तरफ़ जाऊँ तो वह वहाँ नहीं होता, मग़रिब की जानिब बढ़ूँ तो वहाँ भी नहीं मिलता।

9शिमाल मैं उसे ढूँडूँ तो वह दिखाई नहीं देता, जुनूब की तरफ़ रुख़ करूँ तो वहाँ भी पोशीदा रहता है।

10क्यूँकि वह मेरी राह को जानता है। अगर वह मेरी जाँच-पड़ताल करता तो मैं ख़ालिस सोना साबित होता।

11मेरे क़दम उस की राह में रहे हैं, मैं राह से न बाईं, न दाईं तरफ़ हटा बल्कि सीधा उस पर चलता रहा।

12मैं उस के होंटों के फ़रमान से बाज़ नहीं आया बल्कि अपने दिल में ही उस के मुँह की बातें मह्फ़ूज़ रखी हैं।

13अगर वह फ़ैसला करे तो कौन उसे रोक सकता है? जो कुछ भी वह करना चाहे उसे अमल में लाता है।

14जो भी मन्सूबा उस ने मेरे लिए बांधा उसे वह ज़रूर पूरा करेगा। और उस के ज़हन में मज़ीद बहुत से ऐसे मन्सूबे हैं।

15इसी लिए मैं उस के हुज़ूर दह्शतज़दा हूँ। जब भी मैं इन बातों पर ध्यान दूँ तो उस से डरता हूँ।

16अल्लाह ने ख़ुद मुझे शिकस्तादिल किया, क़ादिर-ए-मुतलक़ ही ने मुझे दह्शत खिलाई है।

17क्यूँकि न मैं तारीकी से तबाह हो रहा हूँ, न इस लिए कि घने अंधेरे ने मेरे चेहरे को ढाँप दिया है।