ईसा हमारा इमाम-ए-आज़म
1जो कुछ हम कह रहे हैं उस की मर्कज़ी बात यह है, हमारा एक ऐसा इमाम-ए-आज़म है जो आसमान पर जलाली ख़ुदा के तख़्त के दहने हाथ बैठा है।
2वहाँ वह मक़्दिस में ख़िदमत करता है, उस हक़ीक़ी मुलाक़ात के ख़ैमे में जिसे इन्सानी हाथों ने खड़ा नहीं किया बल्कि रब ने।
3हर इमाम-ए-आज़म को नज़राने और क़ुर्बानियाँ पेश करने के लिए मुक़र्रर किया जाता है। इस लिए लाज़िम है कि हमारे इमाम-ए-आज़म के पास भी कुछ हो जो वह पेश कर सके।
4अगर यह दुनिया में होता तो इमाम-ए-आज़म न होता, क्यूँकि यहाँ इमाम तो हैं जो शरीअत के मतलूबा नज़राने पेश करते हैं।
5जिस मक़्दिस में वह ख़िदमत करते हैं वह उस मक़्दिस की सिर्फ़ नक़ली सूरत और साया है जो आसमान पर है। यही वजह है कि अल्लाह ने मूसा को मुलाक़ात का ख़ैमा बनाने से पहले आगाह करके यह कहा, “ग़ौर कर कि सब कुछ ऐन उस नमूने के मुताबिक़ बनाया जाए जो मैं तुझे यहाँ पहाड़ पर दिखाता हूँ।”
6लेकिन जो ख़िदमत ईसा को मिल गई है वह दुनिया के इमामों की ख़िदमत से कहीं बेहतर है, उतनी बेहतर जितना वह अह्द जिस का दरमियानी ईसा है पुराने अह्द से बेहतर है। क्यूँकि यह अह्द बेहतर वादों की बुन्याद पर बांधा गया।
7अगर पहला अह्द बेइल्ज़ाम होता तो फिर नए अह्द की ज़रूरत न होती।
8लेकिन अल्लाह को अपनी क़ौम पर इल्ज़ाम लगाना पड़ा। उस ने कहा,
9यह उस अह्द की मानिन्द नहीं होगा
10ख़ुदावन्द फ़रमाता है कि
11उस वक़्त से इस की ज़रूरत नहीं रहेगी
12क्यूँकि मैं उन का क़ुसूर मुआफ़ करूँगा
13इन अल्फ़ाज़ में अल्लाह एक नए अह्द का ज़िक्र करता है और यूँ पुराने अह्द को मतरूक क़रार देता है। और जो मतरूक और पुराना है उस का अन्जाम क़रीब ही है।