जिबिआ को सज़ा देने का फ़ैसला
1तमाम इस्राईली एक दिल हो कर मिस्फ़ाह में रब के हुज़ूर जमा हुए। शिमाल के दान से ले कर जुनूब के बैर-सबा तक सब आए। दरया-ए-यर्दन के पार जिलिआद से भी लोग आए।
2इस्राईली क़बीलों के सरदार भी आए। उन्हों ने मिल कर एक बड़ी फ़ौज तय्यार की, तलवारों से लेस 4,00,000 मर्द जमा हुए।
3बिनयमीनियों को इस जमाअत के बारे में इत्तिला मिली।
4मक़्तूला के शौहर ने उन्हें अपनी कहानी सुनाई, “मैं अपनी दाश्ता के साथ जिबिआ में आ ठहरा जो बिनयमीनियों के इलाक़े में है। हम वहाँ रात गुज़ारना चाहते थे।
5यह देख कर शहर के मर्दों ने मेरे मेज़्बान के घर को घेर लिया ताकि मुझे क़त्ल करें। मैं तो बच गया, लेकिन मेरी दाश्ता से इतनी ज़ियादती हुई कि वह मर गई।
6यह देख कर मैं ने उस की लाश को टुकड़े टुकड़े करके यह टुकड़े इस्राईल की मीरास की हर जगह भेज दिए ताकि हर एक को मालूम हो जाए कि हमारे मुल्क में कितना घिनौना जुर्म सरज़द हुआ है।
7इस पर आप सब यहाँ जमा हुए हैं। इस्राईल के मर्दो, अब लाज़िम है कि आप एक दूसरे से मश्वरा करके फ़ैसला करें कि क्या करना चाहिए।”
8तमाम मर्द एक दिल हो कर खड़े हुए। सब का फ़ैसला था, “हम में से कोई भी अपने घर वापस नहीं जाएगा
9जब तक जिबिआ को मुनासिब सज़ा न दी जाए। लाज़िम है कि हम फ़ौरन शहर पर हम्ला करें और इस के लिए क़ुरआ डाल कर रब से हिदायत लें।
10हम यह फ़ैसला भी करें कि कौन कौन हमारी फ़ौज के लिए खाने-पीने का बन्द-ओ-बस्त कराएगा। इस काम के लिए हम में से हर दसवाँ आदमी काफ़ी है। बाक़ी सब लोग सीधे जिबिआ से लड़ने जाएँ ताकि उस शर्मनाक जुर्म का मुनासिब बदला लें जो इस्राईल में हुआ है।”
11यूँ तमाम इस्राईली मुत्तहिद हो कर जिबिआ से लड़ने के लिए गए।
12रास्ते में उन्हों ने बिनयमीन के हर कुंबे को पैग़ाम भिजवाया, “आप के दरमियान घिनौना जुर्म हुआ है।
13अब जिबिआ के इन शरीर आदमियों को हमारे हवाले करें ताकि हम उन्हें सज़ा-ए-मौत दे कर इस्राईल में से बुराई मिटा दें।”
14वह पूरे क़बाइली इलाक़े से आ कर जिबिआ में जमा हुए ताकि इस्राईलियों से लड़ें।
15उसी दिन उन्हों ने अपनी फ़ौज का बन्द-ओ-बस्त किया। जिबिआ के 700 तजरिबाकार फ़ौजियों के इलावा तलवारों से लेस 26,000 अफ़राद थे।
16इन फ़ौजियों में से 700 ऐसे मर्द भी थे जो अपने बाएँ हाथ से फ़लाख़न चलाने की इतनी महारत रखते थे कि पत्थर बाल जैसे छोटे निशाने पर भी लग जाता था।
17दूसरी तरफ़ इस्राईल के 4,00,000 फ़ौजी खड़े हुए, और हर एक के पास तलवार थी।
18पहले इस्राईली बैत-एल चले गए। वहाँ उन्हों ने अल्लाह से दरयाफ़्त किया, “कौन सा क़बीला हमारे आगे आगे चले जब हम बिनयमीनियों पर हम्ला करें?” रब ने जवाब दिया, “यहूदाह सब से आगे चले।”
बिनयमीन के ख़िलाफ़ जंग
19अगले दिन इस्राईली रवाना हुए और जिबिआ के क़रीब पहुँच कर अपनी लश्करगाह लगाई।
20फिर वह हम्ला के लिए निकले और तरतीब से लड़ने के लिए खड़े हो गए।
21यह देख कर बिनयमीनी शहर से निकले और उन पर टूट पड़े। नतीजे में 22,000 इस्राईली शहीद हो गए।
22इस्राईली बैत-एल चले गए और शाम तक रब के हुज़ूर रोते रहे। उन्हों ने रब से पूछा, “क्या हम दुबारा अपने बिनयमीनी भाइयों से लड़ने जाएँ?” रब ने जवाब दिया, “हाँ, उन पर हम्ला करो!” यह सुन कर इस्राईलियों का हौसला बढ़ गया और वह अगले दिन वहीं खड़े हो गए जहाँ पहले दिन खड़े हुए थे।
24लेकिन जब वह शहर के क़रीब पहुँचे
25तो बिनयमीनी पहले की तरह शहर से निकल कर उन पर टूट पड़े। उस दिन तलवार से लेस 18,000 इस्राईली शहीद हो गए।
26फिर इस्राईल का पूरा लश्कर बैत-एल चला गया। वहाँ वह शाम तक रब के हुज़ूर रोते और रोज़ा रखते रहे। उन्हों ने रब को भस्म होने वाली क़ुर्बानियाँ और सलामती की क़ुर्बानियाँ पेश करके
27उस से दरयाफ़्त किया कि हम क्या करें। (उस वक़्त अल्लाह के अह्द का सन्दूक़ बैत-एल में था
28जहाँ फ़ीन्हास बिन इलीअज़र बिन हारून इमाम था।) इस्राईलियों ने पूछा, “क्या हम एक और मर्तबा अपने बिनयमीनी भाइयों से लड़ने जाएँ या इस से बाज़ आएँ?” रब ने जवाब दिया, “उन पर हम्ला करो, क्यूँकि कल ही मैं उन्हें तुम्हारे हवाले कर दूँगा।”
बिनयमीन का सत्यानास
29इस दफ़ा कुछ इस्राईली जिबिआ के इर्दगिर्द घात में बैठ गए।
30बाक़ी अफ़राद पहले दो दिनों की सी तरतीब के मुताबिक़ लड़ने के लिए खड़े हो गए।
31बिनयमीनी दुबारा शहर से निकल कर उन पर टूट पड़े। जो रास्ते बैत-एल और जिबिआ की तरफ़ ले जाते हैं उन पर और खुले मैदान में उन्हों ने तक़रीबन 30 इस्राईलियों को मार डाला। यूँ लड़ते लड़ते वह शहर से दूर होते गए।
32वह पुकारे, “अब हम उन्हें पहली दो मर्तबा की तरह शिकस्त देंगे!”
33यूँ वह भागने लगे और बिनयमीनी उन के पीछे पड़ गए। लेकिन बाल-तमर के क़रीब इस्राईली रुक कर मुड़ गए और उन का सामना करने लगे। अब बाक़ी इस्राईली जो जिबा के इर्दगिर्द और खुले मैदान में घात में बैठे थे अपनी छुपने की जगहों से निकल आए।
34अचानक जिबिआ के बिनयमीनियों को 10,000 बेहतरीन फ़ौजियों का सामना करना पड़ा, उन मर्दों का जो पूरे इस्राईल से चुने गए थे। बिनयमीनी उन से ख़ूब लड़ने लगे, लेकिन उन की आँखें अभी इस बात के लिए बन्द थीं कि उन का अन्जाम क़रीब आ गया है।
35उस दिन इस्राईलियों ने रब की मदद से फ़त्ह पा कर तलवार से लेस 25,100 बिनयमीनी फ़ौजियों को मौत के घाट उतार दिया।
36तब बिनयमीनियों ने जान लिया कि दुश्मन हम पर ग़ालिब आ गए हैं। क्यूँकि इस्राईली फ़ौज ने अपने भाग जाने से उन्हें जिबिआ से दूर खैंच लिया था ताकि शहर के इर्दगिर्द घात में बैठे मर्दों को शहर पर हम्ला करने का मौक़ा मुहय्या करें।
37तब यह मर्द निकल कर शहर पर टूट पड़े और तलवार से तमाम बाशिन्दों को मार डाला,
38फिर मन्सूबे के मुताबिक़ आग लगा कर धुएँ का बड़ा बादल पैदा किया ताकि भागने वाले इस्राईलियों को इशारा मिल जाए कि वह मुड़ कर बिनयमीनियों का मुक़ाबला करें।
40अचानक उन के पीछे धुएँ का बादल आसमान की तरफ़ उठने लगा। जब बिनयमीनियों ने मुड़ कर देखा कि शहर के कोने कोने से धुआँ निकल रहा है
41तो इस्राईल के मर्द रुक गए और पलट कर उन का सामना करने लगे।
42तब उन्हों ने मशरिक़ के रेगिस्तान की तरफ़ फ़रार होने की कोशिश की। लेकिन अब वह मर्द भी उन का ताक़्क़ुब करने लगे जिन्हों ने घात में बैठ कर जिबिआ पर हम्ला किया था। यूँ इस्राईलियों ने मफ़रूरों को घेर कर मार डाला।
44उस वक़्त बिनयमीन के 18,000 तजरिबाकार फ़ौजी हलाक हुए।
45जो बच गए वह रेगिस्तान की चटान रिम्मोन की तरफ़ भाग निकले। लेकिन इस्राईलियों ने रास्ते में उन के 5,000 अफ़राद को मौत के घाट उतार दिया। इस के बाद उन्हों ने जिदओम तक उन का ताक़्क़ुब किया। मज़ीद 2,000 बिनयमीनी हलाक हुए।
46इस तरह बिनयमीन के कुल 25,000 तलवार से लेस और तजरिबाकार फ़ौजी मारे गए।
47सिर्फ़ 600 मर्द बच कर रिम्मोन की चटान तक पहुँच गए। वहाँ वह चार महीने तक टिके रहे।
48तब इस्राईली ताक़्क़ुब करने से बाज़ आ कर बिनयमीन के क़बाइली इलाक़े में वापस आए। वहाँ उन्हों ने जगह-ब-जगह जा कर सब कुछ मौत के घाट उतार दिया। जो भी उन्हें मिला वह तलवार की ज़द में आ गया, ख़्वाह इन्सान था या हैवान। साथ साथ उन्हों ने तमाम शहरों को आग लगा दी।