अल्लाह की अबदी वफ़ादारी
1रब की हम्द हो! ऐ मेरी जान, रब की हम्द कर।
2जीते जी मैं रब की सताइश करूँगा, उम्र भर अपने ख़ुदा की मद्हसराई करूँगा।
3शुरफ़ा पर भरोसा न रखो, न आदमज़ाद पर जो नजात नहीं दे सकता।
4जब उस की रूह निकल जाए तो वह दुबारा ख़ाक में मिल जाता है, उसी वक़्त उस के मन्सूबे अधूरे रह जाते हैं।
5मुबारक है वह जिस का सहारा याक़ूब का ख़ुदा है, जो रब अपने ख़ुदा के इन्तिज़ार में रहता है।
6क्यूँकि उस ने आसमान-ओ-ज़मीन, समुन्दर और जो कुछ उन में है बनाया है। वह हमेशा तक वफ़ादार है।
7वह मज़्लूमों का इन्साफ़ करता और भूकों को रोटी खिलाता है। रब क़ैदियों को आज़ाद करता है।
8रब अंधों की आँखें बहाल करता और ख़ाक में दबे हुओं को उठा खड़ा करता है, रब रास्तबाज़ को प्यार करता है।
9रब परदेसियों की देख-भाल करता, यतीमों और बेवाओं को क़ाइम रखता है। लेकिन वह बेदीनों की राह को टेढ़ा बना कर कामयाब होने नहीं देता।
10रब अबद तक हुकूमत करेगा। ऐ सिय्यून, तेरा ख़ुदा पुश्त-दर-पुश्त बादशाह रहेगा। रब की हम्द हो।