अल्लाह मग़रूरों की अदालत करता है
1आसफ़ का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। तर्ज़ : तबाह न कर।
2अल्लाह फ़रमाता है, “जब मेरा वक़्त आएगा तो मैं इन्साफ़ से अदालत करूँगा।
3गो ज़मीन अपने बाशिन्दों समेत डगमगाने लगे, लेकिन मैं ही ने उस के सतूनों को मज़बूत कर दिया है। (सिलाह)
4शेख़ीबाज़ों से मैं ने कहा, ‘डींगें मत मारो,’ और बेदीनों से, ‘अपने आप पर फ़ख़र मत करो।
5न अपनी ताक़त पर शेख़ी मारो,
6क्यूँकि सरफ़राज़ी न मशरिक़ से, न मग़रिब से और न बयाबान से आती है
7बल्कि अल्लाह से जो मुन्सिफ़ है। वही एक को पस्त कर देता है और दूसरे को सरफ़राज़।
8क्यूँकि रब के हाथ में झागदार और मसालेदार मै का प्याला है जिसे वह लोगों को पिला देता है। यक़ीनन दुनिया के तमाम बेदीनों को इसे आख़िरी क़तरे तक पीना है।
9लेकिन मैं हमेशा अल्लाह के अज़ीम काम सुनाऊँगा, हमेशा याक़ूब के ख़ुदा की मद्हसराई करूँगा।
10अल्लाह फ़रमाता है, “मैं तमाम बेदीनों की कमर तोड़ दूँगा जबकि रास्तबाज़ सरफ़राज़ होगा।”