ज़बूर 9:1-20 DGV - Bible AI

अल्लाह की क़ुदरत और इन्साफ़

1दाऊद का ज़बूर। मौसीक़ी के राहनुमा के लिए। तर्ज़ : अलामूत-लब्बीन। ऐ रब, मैं पूरे दिल से तेरी सताइश करूँगा, तेरे तमाम मोजिज़ात का बयान करूँगा।

2मैं शादमान हो कर तेरी ख़ुशी मनाऊँगा। ऐ अल्लाह तआला, मैं तेरे नाम की तम्जीद में गीत गाऊँगा।

3जब मेरे दुश्मन पीछे हट जाएंगे तो वह ठोकर खा कर तेरे हुज़ूर तबाह हो जाएंगे।

4क्यूँकि तू ने मेरा इन्साफ़ किया है, तू तख़्त पर बैठ कर रास्त मुन्सिफ़ साबित हुआ है।

5तू ने अक़्वाम को मलामत करके बेदीनों को हलाक कर दिया, उन का नाम-ओ-निशान हमेशा के लिए मिटा दिया है।

6दुश्मन तबाह हो गया, अबद तक मल्बे का ढेर बन गया है। तू ने शहरों को जड़ से उखाड़ दिया है, और उन की याद तक बाक़ी नहीं रहेगी।

7लेकिन रब हमेशा तक तख़्तनशीन रहेगा, और उस ने अपने तख़्त को अदालत करने के लिए खड़ा किया है।

8वह रास्ती से दुनिया की अदालत करेगा, इन्साफ़ से उम्मतों का फ़ैसला करेगा।

9रब मज़्लूमों की पनाहगाह है, एक क़िला जिस में वह मुसीबत के वक़्त मह्फ़ूज़ रहते हैं।

10ऐ रब, जो तेरा नाम जानते वह तुझ पर भरोसा रखते हैं। क्यूँकि जो तेरे तालिब हैं उन्हें तू ने कभी तर्क नहीं किया।

11रब की तम्जीद में गीत गाओ जो सिय्यून पहाड़ पर तख़्तनशीन है, उम्मतों में वह कुछ सुनाओ जो उस ने किया है।

12क्यूँकि जो मक़्तूलों का इन्तिक़ाम लेता है वह मुसीबतज़दों की चीख़ें नज़रअन्दाज़ नहीं करता।

13ऐ रब, मुझ पर रहम कर! मेरी उस तक्लीफ़ पर ग़ौर कर जो नफ़रत करने वाले मुझे पहुँचा रहे हैं। मुझे मौत के दरवाज़ों में से निकाल कर उठा ले

14ताकि मैं सिय्यून बेटी के दरवाज़ों में तेरी सताइश करके वह कुछ सुनाऊँ जो तू ने मेरे लिए किया है, ताकि मैं तेरी नजात की ख़ुशी मनाऊँ।

15अक़्वाम उस गढ़े में ख़ुद गिर गई हैं जो उन्हों ने दूसरों को पकड़ने के लिए खोदा था। उन के अपने पाँओ उस जाल में फंस गए हैं जो उन्हों ने दूसरों को फंसाने के लिए बिछा दिया था।

16रब ने इन्साफ़ करके अपना इज़हार किया तो बेदीन अपने हाथ के फंदे में उलझ गया। (हिग्गायून का तर्ज़। सिलाह)

17बेदीन पाताल में उतरेंगे, जो उम्मतें अल्लाह को भूल गई हैं वह सब वहाँ जाएँगी।

18क्यूँकि वह ज़रूरतमन्दों को हमेशा तक नहीं भूलेगा, मुसीबतज़दों की उम्मीद अबद तक जाती नहीं रहेगी।

19ऐ रब, उठ खड़ा हो ताकि इन्सान ग़ालिब न आए। बख़्श दे कि तेरे हुज़ूर अक़्वाम की अदालत की जाए।

20ऐ रब, उन्हें दह्शतज़दा कर ताकि अक़्वाम जान लें कि इन्सान ही हैं। (सिलाह)

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