इस्हाक़ याक़ूब को बरकत देता है
1इस्हाक़ बूढ़ा हो गया तो उस की नज़र धुन्दला गई। उस ने अपने बड़े बेटे को बुला कर कहा, “बेटा।” एसौ ने जवाब दिया, “जी, मैं हाज़िर हूँ।”
2इस्हाक़ ने कहा, “मैं बूढ़ा हो गया हूँ और ख़ुदा जाने कब मर जाऊँ।
3इस लिए अपना तीर कमान ले कर जंगल में निकल जा और मेरे लिए किसी जानवर का शिकार कर।
4उसे तय्यार करके ऐसा लज़ीज़ खाना पका जो मुझे पसन्द है। फिर उसे मेरे पास ले आ। मरने से पहले मैं वह खाना खा कर तुझे बरकत देना चाहता हूँ।”
5रिब्क़ा ने इस्हाक़ की एसौ के साथ बातचीत सुन ली थी। जब एसौ शिकार करने के लिए चला गया तो उस ने याक़ूब से कहा,
6“अभी अभी मैं ने तुम्हारे अब्बू को एसौ से यह बात करते हुए सुना कि
7‘मेरे लिए किसी जानवर का शिकार करके ले आ। उसे तय्यार करके मेरे लिए लज़ीज़ खाना पका। मरने से पहले मैं यह खाना खा कर तुझे रब के सामने बरकत देना चाहता हूँ।’
8अब सुनो, मेरे बेटे! जो कुछ मैं बताती हूँ वह करो।
9जा कर रेवड़ में से बकरियों के दो अच्छे अच्छे बच्चे चुन लो। फिर मैं वही लज़ीज़ खाना पकाऊँगी जो तुम्हारे अब्बू को पसन्द है।
10तुम यह खाना उस के पास ले जाओगे तो वह उसे खा कर मरने से पहले तुम्हें बरकत देगा।”
11लेकिन याक़ूब ने एतिराज़ किया, “आप जानती हैं कि एसौ के जिस्म पर घने बाल हैं जबकि मेरे बाल कम हैं।
12कहीं मुझे छूने से मेरे बाप को पता न चल जाए कि मैं उसे फ़रेब दे रहा हूँ। फिर मुझ पर बरकत नहीं बल्कि लानत आएगी।”
13उस की माँ ने कहा, “तुम पर आने वाली लानत मुझ पर आए, बेटा। बस मेरी बात मान लो। जाओ और बकरियों के वह बच्चे ले आओ।”
14चुनाँचे वह गया और उन्हें अपनी माँ के पास ले आया। रिब्क़ा ने ऐसा लज़ीज़ खाना पकाया जो याक़ूब के बाप को पसन्द था।
15एसौ के ख़ास मौक़ों के लिए अच्छे लिबास रिब्क़ा के पास घर में थे। उस ने उन में से बेहतरीन लिबास चुन कर अपने छोटे बेटे को पहना दिया।
16साथ साथ उस ने बकरियों की खालें उस के हाथों और गर्दन पर जहाँ बाल न थे लपेट दीं।
17फिर उस ने अपने बेटे याक़ूब को रोटी और वह लज़ीज़ खाना दिया जो उस ने पकाया था।
18याक़ूब ने अपने बाप के पास जा कर कहा, “अब्बू जी।” इस्हाक़ ने कहा, “जी, बेटा। तू कौन है?”
19उस ने कहा, “मैं आप का पहलौठा एसौ हूँ। मैं ने वह किया है जो आप ने मुझे कहा था। अब ज़रा उठें और बैठ कर मेरे शिकार का खाना खाएँ ताकि आप बाद में मुझे बरकत दें।”
20इस्हाक़ ने पूछा, “बेटा, तुझे यह शिकार इतनी जल्दी किस तरह मिल गया?” उस ने जवाब दिया, “रब आप के ख़ुदा ने उसे मेरे सामने से गुज़रने दिया।”
21इस्हाक़ ने कहा, “बेटा, मेरे क़रीब आ ताकि मैं तुझे छू लूँ कि तू वाक़ई मेरा बेटा एसौ है कि नहीं।”
22याक़ूब अपने बाप के नज़्दीक आया। इस्हाक़ ने उसे छू कर कहा, “तेरी आवाज़ तो याक़ूब की है लेकिन तेरे हाथ एसौ के हैं।”
23यूँ उस ने फ़रेब खाया। चूँकि याक़ूब के हाथ एसौ के हाथ की मानिन्द थे इस लिए उस ने उसे बरकत दी।
24तो भी उस ने दुबारा पूछा, “क्या तू वाक़ई मेरा बेटा एसौ है?” याक़ूब ने जवाब दिया, “जी, मैं वही हूँ।”
25आख़िरकार इस्हाक़ ने कहा, “शिकार का खाना मेरे पास ले आ, बेटा। उसे खाने के बाद मैं तुझे बरकत दूँगा।” याक़ूब खाना और मै ले आया। इस्हाक़ ने खाया और पिया,
26फिर कहा, “बेटा, मेरे पास आ और मुझे बोसा दे।”
27याक़ूब ने पास आ कर उसे बोसा दिया। इस्हाक़ ने उस के लिबास को सूँघ कर उसे बरकत दी। उस ने कहा,
28अल्लाह तुझे आसमान की ओस और ज़मीन की ज़रख़ेज़ी दे। वह तुझे कस्रत का अनाज और अंगूर का रस दे।
29क़ौमें तेरी ख़िदमत करें, और उम्मतें तेरे सामने झुक जाएँ। अपने भाइयों का हुक्मरान बन, और तेरी माँ की औलाद तेरे सामने घुटने टेके। जो तुझ पर लानत करे वह ख़ुद लानती हो और जो तुझे बरकत दे वह ख़ुद बरकत पाए।”
एसौ भी बरकत माँगता है
30इस्हाक़ की बरकत के बाद याक़ूब अभी रुख़्सत ही हुआ था कि उस का भाई एसौ शिकार करके वापस आया।
31वह भी लज़ीज़ खाना पका कर उसे अपने बाप के पास ले आया। उस ने कहा, “अब्बू जी, उठें और मेरे शिकार का खाना खाएँ ताकि आप मुझे बरकत दें।”
32इस्हाक़ ने पूछा, “तू कौन है?” उस ने जवाब दिया, “मैं आप का बड़ा बेटा एसौ हूँ।”
33इस्हाक़ घबरा कर शिद्दत से काँपने लगा। उस ने पूछा, “फिर वह कौन था जो किसी जानवर का शिकार करके मेरे पास ले आया? तेरे आने से ज़रा पहले मैं ने उस शिकार का खाना खा कर उस शख़्स को बरकत दी। अब वह बरकत उसी पर रहेगी।”
34यह सुन कर एसौ ज़ोरदार और तल्ख़ चीख़ें मारने लगा। “अब्बू, मुझे भी बरकत दें,” उस ने कहा।
35लेकिन इस्हाक़ ने जवाब दिया, “तेरे भाई ने आ कर मुझे फ़रेब दिया। उस ने तेरी बरकत तुझ से छीन ली है।”
36एसौ ने कहा, “उस का नाम याक़ूब ठीक ही रखा गया है, क्यूँकि अब उस ने मुझे दूसरी बार धोका दिया है। पहले उस ने पहलौठे का हक़ मुझ से छीन लिया और अब मेरी बरकत भी ज़बरदस्ती ले ली। क्या आप ने मेरे लिए कोई बरकत मह्फ़ूज़ नहीं रखी?”
37लेकिन इस्हाक़ ने कहा, “मैं ने उसे तेरा हुक्मरान और उस के तमाम भाइयों को उस के ख़ादिम बना दिया है। मैं ने उसे अनाज और अंगूर का रस मुहय्या किया है। अब मुझे बता बेटा, क्या कुछ रह गया है जो मैं तुझे दूँ?”
38लेकिन एसौ ख़ामोश न हुआ बल्कि कहा, “अब्बू, क्या आप के पास वाक़ई सिर्फ़ यही बरकत थी? अब्बू, मुझे भी बरकत दें।” वह ज़ार-ओ-क़तार रोने लगा।
39फिर इस्हाक़ ने कहा, “तू ज़मीन की ज़रख़ेज़ी और आसमान की ओस से महरूम रहेगा।
40तू सिर्फ़ अपनी तलवार के सहारे ज़िन्दा रहेगा और अपने भाई की ख़िदमत करेगा। लेकिन एक दिन तू बेचैन हो कर उस का जूआ अपनी गर्दन पर से उतार फैंकेगा।”
याक़ूब की हिज्रत
41बाप की बरकत के सबब से एसौ याक़ूब का दुश्मन बन गया। उस ने दिल में कहा, “वह दिन क़रीब आ गए हैं कि अब्बू इन्तिक़ाल कर जाएंगे और हम उन का मातम करेंगे। फिर मैं अपने भाई को मार डालूँगा।”
42रिब्क़ा को अपने बड़े बेटे एसौ का यह इरादा मालूम हुआ। उस ने याक़ूब को बुला कर कहा, “तुम्हारा भाई बदला लेना चाहता है। वह तुम्हें क़त्ल करने का इरादा रखता है।
43बेटा, अब मेरी सुनो, यहाँ से हिज्रत कर जाओ। हारान शहर में मेरे भाई लाबन के पास चले जाओ।
44वहाँ कुछ दिन ठहरे रहना जब तक तुम्हारे भाई का ग़ुस्सा ठंडा न हो जाए।
45जब उस का ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा और वह तुम्हारे उस के साथ किए गए सुलूक को भूल जाएगा, तब मैं इत्तिला दूँगी कि तुम वहाँ से वापस आ सकते हो। मैं क्यूँ एक ही दिन में तुम दोनों से महरूम हो जाऊँ?”
46फिर रिब्क़ा ने इस्हाक़ से बात की, “मैं एसौ की बीवियों के सबब से अपनी ज़िन्दगी से तंग हूँ। अगर याक़ूब भी इस मुल्क की औरतों में से किसी से शादी करे तो बेहतर है कि मैं पहले ही मर जाऊँ।”