वाइज़ 7:1-29 DGV - Bible AI

अच्छा क्या है?

1अच्छा नाम ख़ुश्बूदार तेल से और मौत का दिन पैदाइश के दिन से बेहतर है।

2ज़ियाफ़त करने वालों के घर में जाने की निस्बत मातम करने वालों के घर में जाना बेहतर है, क्यूँकि हर इन्सान का अन्जाम मौत ही है। जो ज़िन्दा हैं वह इस बात पर ख़ूब ध्यान दें।

3दुख हंसी से बेहतर है, उतरा हुआ चेहरा दिल की बेहतरी का बाइस है।

4दानिशमन्द का दिल मातम करने वालों के घर में ठहरता जबकि अहमक़ का दिल ऐश-ओ-इश्रत करने वालों के घर में टिक जाता है।

5अहमक़ों के गीत सुनने की निस्बत दानिशमन्द की झिड़कियों पर ध्यान देना बेहतर है।

6अहमक़ के क़ह्क़हे देगची तले चटख़ने वाले काँटों की आग की मानिन्द हैं। यह भी बातिल ही है।

7नारवा नफ़ा दानिशमन्द को अहमक़ बना देता, रिश्वत दिल को बिगाड़ देती है।

8किसी मुआमले का अन्जाम उस की इब्तिदा से बेहतर है, सब्र करना मग़रूर होने से बेहतर है।

9ग़ुस्सा करने में जल्दी न कर, क्यूँकि ग़ुस्सा अहमक़ों की गोद में ही आराम करता है।

10यह न पूछ कि आज की निस्बत पुराना ज़माना बेहतर क्यूँ था, क्यूँकि यह हिक्मत की बात नहीं।

11अगर हिक्मत के इलावा मीरास में मिलकियत भी मिल जाए तो यह अच्छी बात है, यह उन के लिए सूदमन्द है जो सूरज देखते हैं।

12क्यूँकि हिक्मत पैसों की तरह पनाह देती है, लेकिन हिक्मत का ख़ास फ़ाइदा यह है कि वह अपने मालिक की जान बचाए रखती है।

13अल्लाह के काम का मुलाहज़ा कर। जो कुछ उस ने पेचदार बनाया कौन उसे सुलझा सकता है?

14ख़ुशी के दिन ख़ुश हो, लेकिन मुसीबत के दिन ख़याल रख कि अल्लाह ने यह दिन भी बनाया और वह भी इस लिए कि इन्सान अपने मुस्तक़बिल के बारे में कुछ मालूम न कर सके।

इन्तिहापसन्दों से दरेग़ कर

15अपनी अबस ज़िन्दगी के दौरान मैं ने दो बातें देखी हैं। एक तरफ़ रास्तबाज़ अपनी रास्तबाज़ी के बावुजूद तबाह हो जाता जबकि दूसरी तरफ़ बेदीन अपनी बेदीनी के बावुजूद उम्ररसीदा हो जाता है।

16न हद से ज़्यादा रास्तबाज़ी दिखा, न हद से ज़्यादा दानिशमन्दी। अपने आप को तबाह करने की क्या ज़रूरत है?

17न हद से ज़्यादा बेदीनी, न हद से ज़्यादा हमाक़त दिखा। मुक़र्ररा वक़्त से पहले मरने की क्या ज़रूरत है?

18अच्छा है कि तू यह बात थामे रखे और दूसरी भी न छोड़े। जो अल्लाह का ख़ौफ़ माने वह दोनों ख़तरों से बच निकलेगा।

19हिक्मत दानिशमन्द को शहर के दस हुक्मरानों से ज़्यादा ताक़तवर बना देती है।

20दुनिया में कोई भी इन्सान इतना रास्तबाज़ नहीं कि हमेशा अच्छा काम करे और कभी गुनाह न करे।

21लोगों की हर बात पर ध्यान न दे, ऐसा न हो कि तू नौकर की लानत भी सुन ले जो वह तुझ पर करता है।

22क्यूँकि दिल में तू जानता है कि तू ने ख़ुद मुतअद्दिद बार दूसरों पर लानत भेजी है।

कौन दानिशमन्द है?

23हिक्मत के ज़रीए मैं ने इन तमाम बातों की जाँच-पड़ताल की। मैं बोला, “मैं दानिशमन्द बनना चाहता हूँ,” लेकिन हिक्मत मुझ से दूर रही।

24जो कुछ मौजूद है वह दूर और निहायत गहरा है। कौन उस की तह तक पहुँच सकता है?

25चुनाँचे मैं रुख़ बदल कर पूरे ध्यान से इस की तहक़ीक़-ओ-तफ़्तीश करने लगा कि हिक्मत और मुख़्तलिफ़ बातों के सहीह नताइज क्या हैं। नीज़, मैं बेदीनी की हमाक़त और बेहुदगी की दीवानगी मालूम करना चाहता था।

26मुझे मालूम हुआ कि मौत से कहीं तल्ख़ वह औरत है जो फंदा है, जिस का दिल जाल और हाथ ज़न्जीरें हैं। जो आदमी अल्लाह को मन्ज़ूर हो वह बच निकलेगा, लेकिन गुनाहगार उस के जाल में उलझ जाएगा।

27वाइज़ फ़रमाता है, “यह सब कुछ मुझे मालूम हुआ जब मैं ने मुख़्तलिफ़ बातें एक दूसरे के साथ मुन्सलिक कीं ताकि सहीह नताइज तक पहुँचूँ।

28लेकिन जिसे मैं ढूँडता रहा वह न मिला। हज़ार अफ़राद में से मुझे सिर्फ़ एक ही दियानतदार मर्द मिला, लेकिन एक भी दियानतदार औरत नहीं।[१]

29मुझे सिर्फ़ इतना ही मालूम हुआ कि गो अल्लाह ने इन्सानों को दियानतदार बनाया, लेकिन वह कई क़िस्म की चालाकियाँ ढूँड निकालते हैं।”

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