२-सलातीन 6:1-33 DGV - Bible AI

कुल्हाड़ी का लोहा पानी की सतह पर तैरता है

1एक दिन कुछ नबी इलीशा के पास आ कर शिकायत करने लगे, “जिस तंग जगह पर हम आप के पास आ कर ठहरे हैं उस में हमारे लिए रहना मुश्किल है।

2क्यूँ न हम दरया-ए-यर्दन पर जाएँ और हर आदमी वहाँ से शहतीर ले आए ताकि हम रहने की नई जगह बना सकें।” इलीशा बोला, “ठीक है, जाएँ।”

3किसी ने गुज़ारिश की, “बराह-ए-करम हमारे साथ चलें।” नबी राज़ी हो कर

4उन के साथ रवाना हुआ।

4दरया-ए-यर्दन के पास पहुँचते ही वह दरख़्त काटने लगे।

5काटते काटते अचानक किसी की कुल्हाड़ी का लोहा पानी में गिर गया। वह चिल्ला उठा, “हाय मेरे आक़ा! यह मेरा नहीं था, मैं ने तो उसे किसी से उधार लिया था।”

6इलीशा ने सवाल किया, “लोहा कहाँ पानी में गिरा?” आदमी ने उसे जगह दिखाई तो नबी ने किसी दरख़्त से शाख़ काट कर पानी में फैंक दी। अचानक लोहा पानी की सतह पर आ कर तैरने लगा।

7इलीशा बोला, “इसे पानी से निकाल लो!” आदमी ने अपना हाथ बढ़ा कर लोहे को पकड़ लिया।

शाम के जंगी मन्सूबे इलीशा के बाइस नाकाम रहते हैं

8शाम और इस्राईल के दरमियान जंग थी। जब कभी बादशाह अपने अफ़्सरों से मश्वरा करके कहता, “हम फ़ुलाँ फ़ुलाँ जगह अपनी लश्करगाह लगा लेंगे”

9तो फ़ौरन मर्द-ए-ख़ुदा इस्राईल के बादशाह को आगाह करता, “फ़ुलाँ जगह से मत गुज़रना, क्यूँकि शाम के फ़ौजी वहाँ घात में बैठे हैं।”

10तब इस्राईल का बादशाह अपने लोगों को मज़कूरा जगह पर भेजता और वहाँ से गुज़रने से मुह्तात रहता था। ऐसा न सिर्फ़ एक या दो दफ़ा बल्कि कई मर्तबा हुआ।

11आख़िरकार शाम के बादशाह ने बहुत रंजीदा हो कर अपने अफ़्सरों को बुलाया और पूछा, “क्या कोई मुझे बता सकता है कि हम में से कौन इस्राईल के बादशाह का साथ देता है?”

12किसी अफ़्सर ने जवाब दिया, “मेरे आक़ा और बादशाह, हम में से कोई नहीं है। मसला यह है कि इस्राईल का नबी इलीशा इस्राईल के बादशाह को वह बातें भी बता देता है जो आप अपने सोने के कमरे में बयान करते हैं।”

13बादशाह ने हुक्म दिया, “जाएँ, उस का पता करें ताकि हम अपने फ़ौजियों को भेज कर उसे पकड़ लें।”

13बादशाह को इत्तिला दी गई कि इलीशा दूतैन नामी शहर में है।

14उस ने फ़ौरन एक बड़ी फ़ौज रथों और घोड़ों समेत वहाँ भेज दी। उन्हों ने रात के वक़्त पहुँच कर शहर को घेर लिया।

15जब इलीशा का नौकर सुब्ह-सवेरे जाग उठा और घर से निकला तो क्या देखता है कि पूरा शहर एक बड़ी फ़ौज से घिरा हुआ है जिस में रथ और घोड़े भी शामिल हैं। उस ने इलीशा से कहा, “हाय मेरे आक़ा, हम क्या करें?”

16लेकिन इलीशा ने उसे तसल्ली दी, “डरो मत! जो हमारे साथ हैं वह उन की निस्बत कहीं ज़्यादा हैं जो दुश्मन के साथ हैं।”

17फिर उस ने दुआ की, “ऐ रब, नौकर की आँखें खोल ताकि वह देख सके।” रब ने इलीशा के नौकर की आँखें खोल दीं तो उस ने देखा कि पहाड़ पर इलीशा के इर्दगिर्द आतिशीं घोड़े और रथ फैले हुए हैं।

18जब दुश्मन इलीशा की तरफ़ बढ़ने लगा तो उस ने दुआ की, “ऐ रब, इन को अंधा कर दे!” रब ने इलीशा की सुनी और उन्हें अंधा कर दिया।

19फिर इलीशा उन के पास गया और कहा, “यह रास्ता सहीह नहीं। आप ग़लत शहर के पास पहुँच गए हैं। मेरे पीछे हो लें तो मैं आप को उस आदमी के पास पहुँचा दूँगा जिसे आप ढूँड रहे हैं।” यह कह कर वह उन्हें सामरिया ले गया।

20जब वह शहर में दाख़िल हुए तो इलीशा ने दुआ की, “ऐ रब, फ़ौजियों की आँखें खोल दे ताकि वह देख सकें।” तब रब ने उन की आँखें खोल दीं, और उन्हें मालूम हुआ कि हम सामरिया में फंस गए हैं।

21जब इस्राईल के बादशाह ने अपने दुश्मनों को देखा तो उस ने इलीशा से पूछा, “मेरे बाप, क्या मैं उन्हें मार दूँ? क्या मैं उन्हें मार दूँ?”

22लेकिन इलीशा ने मना किया, “ऐसा मत करें। क्या आप अपने जंगी क़ैदियों को मार देते हैं? नहीं, उन्हें खाना खिलाएँ, पानी पिलाएँ और फिर उन के मालिक के पास वापस भेज दें।”

23चुनाँचे बादशाह ने उन के लिए बड़ी ज़ियाफ़त का एहतिमाम किया और खाने-पीने से फ़ारिग़ होने पर उन्हें उन के मालिक के पास वापस भेज दिया। इस के बाद इस्राईल पर शाम की तरफ़ से लूट-मार के छापे बन्द हो गए।

सामरिया का मुहासरा

24कुछ देर के बाद शाम का बादशाह बिन-हदद अपनी पूरी फ़ौज जमा करके इस्राईल पर चढ़ आया और सामरिया का मुहासरा किया।

25नतीजे में शहर में शदीद काल पड़ा। आख़िर में गधे का सर चाँदी के 80 सिक्कों में और कबूतर की मुट्ठी भर बीट चाँदी के 5 सिक्कों में मिलती थी।

26एक दिन इस्राईल का बादशाह यूराम शहर की फ़सील पर सैर कर रहा था तो एक औरत ने उस से इल्तिमास की, “ऐ मेरे आक़ा और बादशाह, मेरी मदद कीजिए।”

27बादशाह ने जवाब दिया, “अगर रब आप की मदद नहीं करता तो मैं किस तरह आप की मदद करूँ? न मैं गाहने की जगह जा कर आप को अनाज दे सकता हूँ, न अंगूर का रस निकालने की जगह जा कर आप को रस पहुँचा सकता हूँ।

28फिर भी मुझे बताएँ, मसला क्या है?” औरत बोली, “इस औरत ने मुझ से कहा था, ‘आएँ, आज आप अपने बेटे को क़ुर्बान करें ताकि हम उसे खा लें, तो फिर कल हम मेरे बेटे को खा लेंगे।’

29चुनाँचे हम ने मेरे बेटे को पका कर खा लिया। अगले दिन मैं ने उस से कहा, ‘अब अपने बेटे को दे दें ताकि उसे भी खा लें।’ लेकिन उस ने उसे छुपाए रखा।”

30यह सुन कर बादशाह ने रंजिश के मारे अपने कपड़े फाड़ डाले। चूँकि वह अभी तक फ़सील पर खड़ा था इस लिए सब लोगों को नज़र आया कि कपड़ों के नीचे वह टाट पहने हुए था।

31उस ने पुकारा, “अल्लाह मुझे सख़्त सज़ा दे अगर मैं इलीशा बिन साफ़त का आज ही सर क़लम न करूँ!”

32उस ने एक आदमी को इलीशा के पास भेजा और ख़ुद भी उस के पीछे चल पड़ा। इलीशा उस वक़्त घर में था, और शहर के बुज़ुर्ग उस के पास बैठे थे। बादशाह का क़ासिद अभी रास्ते में था कि इलीशा बुज़ुर्गों से कहने लगा, “अब ध्यान करें, इस क़ातिल बादशाह ने किसी को मेरा सर क़लम करने के लिए भेज दिया है। उसे अन्दर आने न दें बल्कि दरवाज़े पर कुंडी लगाएँ। उस के पीछे पीछे उस के मालिक के क़दमों की आहट भी सुनाई दे रही है।”

33इलीशा अभी बात कर ही रहा था कि क़ासिद पहुँच गया और उस के पीछे बादशाह भी। बादशाह बोला, “रब ही ने हमें इस मुसीबत में फंसा दिया है। मैं मज़ीद उस की मदद के इन्तिज़ार में क्यूँ रहूँ?”